क्षत्तु: कौशारवेस्तस्य संवादोऽध्यात्मसंश्रित: ।
यद्वा स भगवांस्तस्मै पृष्टस्तत्त्वमुवाच ह ॥ ४९ ॥
ब्रूहि नस्तदिदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम् ।
बन्धुत्यागनिमित्तं च यथैवागतवान् पुन: ॥ ५० ॥
अनुवाद
ऋषि शौनक ने कहा - हे सूत जी, आप हमें बताएँ कि विदुर और मैत्रेय के बीच अध्यात्म पर कैसी चर्चा हुई और दोनों ने क्या-क्या बातें कीं? विदुर ने किस बारे में प्रश्न किए और मैत्रेय ने किस प्रकार उत्तर दिए, वह सब हमें विस्तार से बताएँ। कृपया यह भी बताएँ कि विदुर ने अपने परिवार वालों को क्यों छोड़ा और फिर घर क्यों वापस आ गए? और यात्रा के दौरान तीर्थस्थलों पर उन्होंने क्या कुछ किया, वह सब हमें बताएँ।
Shaunak Rishi said—Please tell us what spiritual discussions took place between Vidur and Maitreya, what Vidur asked and what Maitreya replied. Please also tell us why Vidur left his family and why he returned home? Also tell us the activities he performed while visiting holy places.
तात्पर्य
श्री सूत गोस्वामी भौतिक जगत के निर्माण और विनाश के विषयों का वर्णन कर रहे थे, पर ऐसा प्रतीत होता है कि शौनक के नेतृत्व में ऋषि, भौतिक से उच्च स्तरीय पारलौकिक विषयों को सुनने के लिए और अधिक इच्छुक थे। मनुष्य दो प्रकार के होते हैं, पहला स्थूल शरीर और भौतिक जगत में बहुत अधिक आसक्त रहने वाले और दूसरा उच्च स्तर पर रहने वाले जो पारलौकिक ज्ञान में अधिक रुचि रखते हैं। श्रीमद् भागवत दोनों को, भौतिकवादी और पारलौकिकवादी, को सुविधा प्रदान करता है। भौतिक जगत और पारलौकिक जगत दोनों में भगवान की गौरवशाली गतिविधियों के विषय में श्रीमद् भागवत को सुनने से मनुष्य समान लाभ प्राप्त कर सकते हैं। भौतिकवादी भौतिक नियमों और उनकी कार्रवाई में अधिक रुचि रखते हैं, और वे उन भौतिक आकर्षणों में अद्भुतता देखते हैं। कभी-कभी, भौतिक आकर्षणों के कारण, वे भगवान के गौरव को भूल जाते हैं। उन्हें स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि भौतिक गतिविधियाँ और उनकी अद्भुतताएँ, सभी भगवान द्वारा आरंभ की जाती हैं। बगीचे में गुलाब धीरे-धीरे अपना आकार लेता है और सुंदर और मीठा बनने के लिए रंग लेता है, यह किसी अंधे भौतिक नियम द्वारा नहीं होता, हालाँकि ऐसा ही प्रतीत होता है। उस भौतिक नियम के पीछे पूर्ण चेतना के सर्वोच्च भगवान का निर्देश है; अन्यथा चीजें इतनी व्यवस्थित रूप से आकार नहीं ले सकतीं। कलाकार बहुत ध्यान और कलात्मक भावना के साथ गुलाब की तस्वीर बहुत अच्छी तरह से बनाता है, और फिर भी यह वास्तविक गुलाब जितनी परिपूर्ण नहीं होती। यदि यही वास्तविक तथ्य है, तो हम कैसे कह सकते हैं कि असली गुलाब ने सुंदरता के पीछे बुद्धि के बिना अपना आकार लिया है? इस प्रकार का निष्कर्ष ज्ञान के अभाव के कारण है। निर्माण और विनाश के उपरोक्त वर्णन से किसी को यह जानना चाहिए कि सर्वोच्च चेतना, सर्वव्यापी होने के कारण, हर चीज की पूरी सावधानी से देखभाल कर सकती है। वही सर्वोच्च भगवान के सर्वव्यापी होने का तथ्य है। हालाँकि, स्थूल भौतिकवादियों से भी अधिक मूर्ख व्यक्ति खुद को पारलौकिकवादी होने का दावा करते हैं और ऐसी सर्वोच्च सर्वव्यापी चेतना का दावा करते हैं, पर कोई प्रमाण नहीं देते। ऐसे मूर्ख व्यक्ति यह नहीं जान पाते कि अगली दीवार के पीछे क्या हो रहा है, फिर भी उन्हें सर्वोच्च व्यक्ति की व्यापक, सर्वव्यापी चेतना रखने पर झूठा गर्व होता है। उनके लिए भी श्रीमद् भागवत को सुनना एक बहुत बड़ी मदद है। इससे उनकी आँखें खुलेंगी और वे देखेंगे कि केवल सर्वोच्च चेतना का दावा करने से कोई सर्वोच्च सचेत नहीं बन जाता। किसी को भौतिक जगत में यह साबित करना होता है कि उसके पास ऐसी सर्वोच्च चेतना है। हालाँकि, नैमिषारण्य के ऋषि स्थूल भौतिकवादियों और झूठे पारलौकिकवादियों से ऊपर थे, और इस प्रकार वे अधिकारियों द्वारा चर्चा किए गए अनुसार, पारलौकिक मामलों में वास्तविक सत्य जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥