| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति » अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है » श्लोक 47 |
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| | | | श्लोक 2.10.47  | परिमाणं च कालस्य कल्पलक्षणविग्रहम् ।
यथा पुरस्ताद्व्याख्यास्ये पाद्मं कल्पमथो शृणु ॥ ४७ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे राजन्, आगे चलकर मैं काल के स्थूल और सूक्ष्म रूपों की माप का उनके विशिष्ट लक्षणों सहित उल्लेख करूँगा, किन्तु इस समय मैं तुमसे पाद्म कल्प के विषय में चर्चा करना चाहता हूँ। | | | | हे राजन्, आगे चलकर मैं काल के स्थूल और सूक्ष्म रूपों की माप का उनके विशिष्ट लक्षणों सहित उल्लेख करूँगा, किन्तु इस समय मैं तुमसे पाद्म कल्प के विषय में चर्चा करना चाहता हूँ। | | ✨ ai-generated | | |
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