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श्लोक 2.10.46  |
अयं तु ब्रह्मण: कल्प: सविकल्प उदाहृत: ।
विधि: साधारणो यत्र सर्गा: प्राकृतवैकृता: ॥ ४६ ॥ |
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| अनुवाद |
| यहाँ वर्णित संक्षिप्त सृजन और विनाश की प्रक्रिया ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) के लिए नियामक सिद्धांत है। यह वही नियामक सिद्धांत है जो महत्-सृष्टि के निर्माण में भी कार्य करता है, जहाँ भौतिक प्रकृति का विसर्जन हो जाता है। |
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| यहाँ वर्णित संक्षिप्त सृजन और विनाश की प्रक्रिया ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) के लिए नियामक सिद्धांत है। यह वही नियामक सिद्धांत है जो महत्-सृष्टि के निर्माण में भी कार्य करता है, जहाँ भौतिक प्रकृति का विसर्जन हो जाता है। |
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