मायाध्यक्षेण प्रकृतिः
सूयते सा-चराचरम
हेतुननेन कौन्तेय
जगद विपरीवर्तते
भौतिक प्रकृति भगवान की ऊर्जाओं में से एक है, और वह प्रभु (अध्यक्षेण) के निर्देशन में काम कर सकती है। जब प्रभु भौतिक प्रकृति पर अपनी आध्यात्मिक दृष्टि डालते हैं, तभी भौतिक प्रकृति कार्य कर सकती है, जैसे कि पिता माँ से संपर्क करता है, जो तब एक बच्चे को गर्भ धारण करने में सक्षम होती है। यद्यपि आम आदमी को लगता है कि माँ बच्चे को जन्म देती है, लेकिन अनुभवी व्यक्ति जानता है कि पिता बच्चे को जन्म देता है। इसलिए भौतिक प्रकृति, सर्वोच्च पिता द्वारा संपर्क किए जाने के बाद, भौतिक दुनिया के चलती और स्थिर अभिव्यक्तियों का उत्पादन करती है, और स्वतंत्र रूप से नहीं। भौतिक प्रकृति को सृजन, रखरखाव आदि का कारण मानना "बकरी की गर्दन पर निपल्स का तर्क" कहलाता है। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा चैतन्य-चरितामृत इस तर्क का वर्णन अजा-गला-स्तन-न्याय के रूप में करता है (जैसा कि उनकी दिव्य कृपा श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज द्वारा समझाया गया है): "भौतिक प्रकृति, भौतिक कारण के रूप में, प्रधान के रूप में जानी जाती है , और कुशल कारण को माया के रूप में जाना जाता है। लेकिन चूंकि यह जड़ पदार्थ है, इसलिए यह सृजन का दूरस्थ कारण नहीं है।" कविराज गोस्वामी निम्नानुसार कहते हैं:
अतएव कृष्ण मूल-जगत्-कारण
प्रकृति - कारण याइचे अजा-गला-स्तना
(Cc. आदि 5.61)
क्योंकि कारनार्णवशायी विष्णु कृष्ण का एक पूर्ण विस्तार है, यह वह है जो पदार्थ को गति में डालने के लिए उसे विद्युतीकृत करता है। विद्युतीकरण का उदाहरण काफी उपयुक्त है। लोहा का एक टुकड़ा निश्चित रूप से आग नहीं है, लेकिन जब लोहे को लाल-गर्म किया जाता है, तो निश्चित रूप से इसमें जलने की क्षमता के माध्यम से आग का गुण होता है। पदार्थ की तुलना लोहे के टुकड़े से की जाती है, और विष्णु की सर्वोच्च चेतना की नज़र या हेरफेर से इसे विद्युतीकृत या लाल-गर्म किया जाता है। केवल इस तरह के विद्युतीकरण से ही विभिन्न कार्यों और प्रतिक्रियाओं में पदार्थ की ऊर्जा प्रदर्शित होती है। इसलिए जड़ पदार्थ न तो कुशल है और न ही ब्रह्मांडीय प्रकटीकरण का भौतिक कारण है। श्री कपिलदेव ने कहा है:
यथोल मुखाद विस्फुलिंगाद
धूमाद वापि स्व-सम्भवद
अप्य आत्मत्वेनभिमताद
यथाग्निः पृथग उल्मुकात
(भाग 3.28.40)
मूल आग, उसकी ज्वाला, उसकी चिंगारियाँ और उसका धुआँ सब एक हैं, क्योंकि आग अभी भी आग है परन्तु वह ज्वाला से भिन्न है, ज्वाला चिंगारियों से भिन्न है और चिंगारियाँ धुएँ से भिन्न हैं। उन सभी में, अर्थात् ज्वालाओं में, चिंगारियों में और धुएँ में, आग की अखंडता विद्यमान है, परन्तु वे सभी अलग-अलग स्थितियों में भिन्न स्थितियों के साथ हैं। ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति की तुलना धुएँ से की जाती है क्योंकि जब धुआँ आकाश के ऊपर से गुजरता है तो बहुत सारे रूप प्रकट होते हैं, जो कई ज्ञात और अज्ञात अभिव्यक्तियों से मिलते-जुलते हैं। चिंगारियों की तुलना जीवित संस्थाओं से की जाती है, और ज्वालाओं की तुलना भौतिक प्रकृति (प्रधान) से की जाती है। यह जानना होगा कि उनमें से प्रत्येक और प्रत्येक केवल मूल अग्नि की गुणवत्ता से सशक्त होने के कारण प्रभावी है। इसलिए वे सभी, अर्थात् भौतिक प्रकृति, ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति और जीवित संस्थाएं, प्रभु (अग्नि) की भिन्न ऊर्जाएँ हैं। इसलिए जो लोग भौतिक प्रकृति को ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के मूल कारण के रूप में स्वीकार करते हैं (प्रकृति, सांख्य दर्शन के अनुसार सृजन का कारण) उनके निष्कर्ष सही नहीं हैं। भौतिक प्रकृति का प्रभु के बिना कोई अलग अस्तित्व नहीं है। इसलिए, सभी कारणों के कारण के रूप में सर्वोच्च प्रभु को अलग रखना अजा-गल-स्तन-न्याय का तर्क है, या बकरी के गले पर निपल्स को दूध देने की कोशिश करना है। बकरी के गले पर निपल्स दूध के स्रोत जैसे लग सकते हैं, परन्तु ऐसे निपल्स से दूध निकालने का प्रयास करना मूर्खतापूर्ण होगा।
