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श्लोक 2.10.44  |
इत्थंभावेन कथितो भगवान् भगवत्तम: ।
नेत्थंभावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरय: ॥ ४४ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार बड़े-बड़े तत्त्वज्ञानी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के कार्यकलापों का वर्णन करते हैं, किन्तु शुद्ध भक्त भावातीत दशा में इन विशेषताओं से भी बढ़कर और अधिक महिमामयी वस्तुओं को देखने के अधिकारी होते हैं। |
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| इस प्रकार बड़े-बड़े तत्त्वज्ञानी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के कार्यकलापों का वर्णन करते हैं, किन्तु शुद्ध भक्त भावातीत दशा में इन विशेषताओं से भी बढ़कर और अधिक महिमामयी वस्तुओं को देखने के अधिकारी होते हैं। |
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