श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.10.42 
स एवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् ।
पुष्णाति स्थापयन् विश्वं तिर्यङ्‍नरसुरादिभि: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
वे व्यक्तित्व भगवान, सृष्टि को स्थापित करने के बाद ब्रह्मांड में सबके रक्षक के रूप में विभिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं और इस प्रकार मनुष्यों, गैर-मानवों और देवताओं में से सभी प्रकार की शर्तों वाली आत्माओं को पुनः प्राप्त करते हैं।
 
The Lord appears in various incarnations in the universe as the protector of all, having established the creation, and delivers all the conditioned souls among humans, non-humans and demigods.
तात्पर्य
परमेश्वर भगवान विष्णु जीवों के विभिन्न समाजों में उन्हें माया के चंगुल से छुड़ाने के लिए स्वयं अवतार लेते हैं, और प्रभु की ऐसी गतिविधियाँ केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं हैं। वे मछली, सूअर, पेड़ और कई अन्य रूपों में भी अवतार लेते हैं, लेकिन कम बुद्धिमान व्यक्ति जिन्हें उनके बारे में कोई ज्ञान नहीं है, वे उनकी निंदा करते हैं, भले ही वे मानव समाज में एक मनुष्य के रूप में हों। इसलिए भगवान भगवद्-गीता (9.11) में कहते हैं:

अवजानन्ति मामूढ़ा

मानुशीं तनुमाश्रितम्

परं भावमजानन्तो

मम भूतमहेश्वरम

जैसा कि हमने पिछले छंदों में पहले ही चर्चा की है, यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भगवान कभी भी भौतिक सृष्टि का उत्पाद नहीं होते हैं। उनकी पारलौकिक स्थिति हमेशा अपरिवर्तित रहती है। वे ज्ञान और आनंद के शाश्वत रूप हैं, और वे अपनी विभिन्न ऊर्जाओं से अपनी सर्वशक्तिमान इच्छा को पूरा करते हैं। जैसे, वे अपने किसी भी कार्य के लिए कभी भी प्रतिक्रियाओं का विषय नहीं होते हैं। वह सभी ऐसी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं की अवधारणाओं से परे हैं। भले ही वे भौतिक दुनिया में दिखाई देते हों, लेकिन प्रदर्शनी केवल उनकी आंतरिक ऊर्जा का है, क्योंकि वे इस भौतिक दुनिया की अच्छी और बुरी अवधारणाओं से ऊपर हैं। भौतिक दुनिया में मछली या सूअर को मनुष्य से नीचा माना जा सकता है, लेकिन जब भगवान मछली या सूअर के रूप में प्रकट होते हैं, तो वे भौतिक अवधारणा में उनमें से कोई भी नहीं होते हैं। यह उनकी अकारण दया है कि वे जीवन के हर समाज या प्रजाति में प्रकट होते हैं, लेकिन उन्हें कभी भी उनमें से एक नहीं माना जाना चाहिए। अच्छे और बुरे, निचले और ऊपरी, महत्वपूर्ण और महत्वहीन जैसी भौतिक दुनिया की अवधारणाएं भौतिक ऊर्जा के अनुमान हैं, और सर्वोच्च भगवान ऐसी सभी अवधारणाओं से परे हैं। परं भावम, या पारलौकिक प्रकृति वाले शब्दों की कभी भी भौतिक अवधारणा से तुलना नहीं की जा सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सर्वशक्तिमान ईश्वर की शक्तियाँ हमेशा समान रहती हैं और कम नहीं होतीं क्योंकि भगवान निम्न श्रेणी के प्राणी का रूप धारण करते हैं। भगवान श्री राम, भगवान श्री कृष्ण और मछली और सूअर के रूप में उनके अवतारों में कोई अंतर नहीं है। वे सर्वव्यापी हैं और साथ ही किसी भी और हर जगह स्थानीयकृत हैं। लेकिन ज्ञान के खराब भंडार वाले मूर्ख व्यक्ति, भगवान के उस परं भावम के अभाव में, यह समझ नहीं पाते कि सर्वोच्च भगवान कैसे मनुष्य या मछली का रूप ले सकते हैं। जैसा कि कुएँ में मेंढक समुद्र को कुएँ के समान मानता है, कोई भी सब कुछ अपने स्वयं के ज्ञान के मानक से तुलना करता है। कुएँ में रहने वाला मेंढक समुद्र के बारे में सोच भी नहीं सकता और जब ऐसा मेंढक समुद्र की महानता के बारे में बताया जाता है, तो वह समुद्र की अवधारणा को कुएँ से थोड़ा बड़ा मानता है। जैसे, जो व्यक्ति भगवान के पारलौकिक विज्ञान के बारे में मूर्ख है, उसे यह समझने में कठिनाई होगी कि भगवान विष्णु सभी जीवों के समाज में स्वयं को समान रूप से कैसे प्रकट कर सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)