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श्लोक 2.10.4  |
स्थितिर्वैकुण्ठविजय: पोषणं तदनुग्रह: ।
मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतय: कर्मवासना: ॥ ४ ॥ |
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| अनुवाद |
| जीवात्मा के लिए उचित यही है कि भगवान् के नियमों का पालन किया जाए, जिससे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के संरक्षण में मन की पूर्ण शांति मिले। मनुओं और उनके नियमों का उद्देश्य जीवन को सही दिशा प्रदान करना है। कार्य करने की प्रेरणा सुखद फलदायी कर्म की इच्छा से मिलती है। |
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| जीवात्मा के लिए उचित यही है कि भगवान् के नियमों का पालन किया जाए, जिससे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के संरक्षण में मन की पूर्ण शांति मिले। मनुओं और उनके नियमों का उद्देश्य जीवन को सही दिशा प्रदान करना है। कार्य करने की प्रेरणा सुखद फलदायी कर्म की इच्छा से मिलती है। |
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