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श्लोक 2.10.35  |
अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते ।
उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चित: ॥ ३५ ॥ |
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| अनुवाद |
| वैष्णव जन तो तेने कहिए... काव्य में प्रयुक्त प्रभु के ऊपर वर्णन किए गए दोनों रूपों में से कोई भी भगवान् को जानने वाले शुद्ध भक्तों द्वारा स्वीकृत नहीं है। |
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| वैष्णव जन तो तेने कहिए... काव्य में प्रयुक्त प्रभु के ऊपर वर्णन किए गए दोनों रूपों में से कोई भी भगवान् को जानने वाले शुद्ध भक्तों द्वारा स्वीकृत नहीं है। |
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