श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.10.35 
अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते ।
उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चित: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
वैष्णव जन तो तेने कहिए... काव्य में प्रयुक्त प्रभु के ऊपर वर्णन किए गए दोनों रूपों में से कोई भी भगवान् को जानने वाले शुद्ध भक्तों द्वारा स्वीकृत नहीं है।
 
Of the two forms of the Lord that I have described to you above from the material point of view, neither of them is accepted by pure devotees who know the Lord.
तात्पर्य
अवैयक्तिकवादी परमेश्वर के निर्गुण स्वरूप की कल्पना दो भिन्न रूपों में करते हैं, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है। एक ओर वे भगवान की विराट रूप में पूजा करते हैं, दूसरी ओर भगवान के अव्यक्त, अवर्णनीय, सूक्ष्म रूप की कल्पना करते हैं। सर्वेश्वर्य के इन दो रूपों, विराट और सूक्ष्म रूप में, पैंथिज्म और अद्वैतवाद के सिद्धांत क्रमशः लागू होते हैं, लेकिन भगवान के ज्ञानी भक्त इन दोनों सिद्धांतों को अस्वीकार करते हैं क्योंकि वे तथ्यात्मक स्थिति से अवगत हैं। भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में यह बहुत स्पष्ट रूप से वर्णित है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप के अर्जुन के अनुभव का वर्णन है:

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा

भयेन च प्रव्यथितं मनो मे

तदेव मे दर्शय देव रूपं

प्रसीद देवेश जगन्निवासा

(भगवद्गीता 11.45)

अर्जुन, भगवान के एक निस्वार्थ भक्त के रूप में, उन्होंने पहले कभी भगवान के विराट रूप (विश्व-रूप) का चिंतन नहीं किया था, परंतु जब उन्होंने इसे देखा, तो उनकी जिज्ञासाएं संतुष्ट हो गईं। लेकिन एक निस्वार्थ भक्त के रूप में अपने लगाव के कारण भगवान का ऐसा रूप देखकर उन्हें खुशी नहीं हुई। वह भगवान की विशालकाय आकृति को देखकर डर गए। इसलिए उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वह अपना चार-हाथ वाला नारायण या कृष्ण रूप धारण करें, जो अकेला ही अर्जुन को प्रसन्न कर सकता था। निःसंदेह, भगवान के पास खुद को अनेक रूपों में प्रकट करने की सर्वोच्च शक्ति है, लेकिन भगवान के निस्वार्थ भक्त केवल भगवान के उन रूपों में रुचि रखते हैं जो भगवान के निवास, त्रिपाद-विभूति या ईश्वर के राज्य में हमेशा के लिए प्रदर्शित होते रहते हैं। त्रिपाद-विभूति निवास में भगवान खुद को दो रूपों में प्रकट करते हैं, या तो चार हाथों से या दो हाथों से। भौतिक प्रकटीकरण में प्रदर्शित विराट-रूप में असीमित हाथ और असीमित आयाम होते हैं जिसमे सब कुछ असीमित होता है। भगवान के निस्वार्थ भक्त भगवान की वैकुण्ठ रूपों जैसे नारायण या कृष्ण के रूप में पूजा करते हैं। कभी-कभी भगवान के वही वैकुण्ठ रूप श्री राम, श्री कृष्ण, श्री नरसिंहदेव, आदि के रूप में उनकी कृपा से भौतिक दुनिया में भी होते हैं, और इस प्रकार निस्वार्थ भक्त उन रूपों की भी पूजा करते हैं। आमतौर पर भौतिक दुनिया में दिखाई जाने वाली विशेषताओं का वैकुण्ठ ग्रहों में कोई अस्तित्व नहीं है, और इस प्रकार निस्वार्थ भक्त उन्हें स्वीकार नहीं करते हैं। निस्वार्थ भक्त जिस चीज की पूजा शुरू से ही करते हैं, वह भगवान के वैकुण्ठ ग्रहों में मौजूद शाश्वत रूप है। गैर-भक्त अवैयक्तिकवादी भगवान के भौतिक रूपों की कल्पना करते हैं, और अंततः वे भगवान के निर्गुण ब्रह्मज्योति में विलीन हो जाते हैं, जबकि भगवान के निस्वार्थ भक्त भगवान के पूजक शुरू से ही और मोक्ष की पूर्ण अवस्था में भी, अनंत काल तक रहते हैं। निस्वार्थ भक्तों की पूजा कभी नहीं रुकती, जबकि अवैयक्तिकवादी की पूजा उसके मोक्ष की प्राप्ति के बाद बंद हो जाती है, जब वह भगवान के निर्गुण रूप में विलीन हो जाता है जिसे ब्रह्मज्योति के रूप में जाना जाता है। इसलिए भगवान के निस्वार्थ भक्तों को यहाँ विपश्चित कहा गया है, या ऐसे विद्वान जो भगवान के ज्ञान में पूर्ण हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)