श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.10.31 
त्वक्‍चर्ममांसरुधिरमेदोमज्जास्थिधातव: ।
भूम्यप्तेजोमया: सप्त प्राणो व्योमाम्बुवायुभि: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
शरीर के सातों तत्व अर्थात त्वचा की पतली परत, त्वचा स्वयं, मांस, रक्त, चर्बी, मज्जा और हड्डी, ये सभी पृथ्वी, जल और अग्नि से बने हैं, जबकि प्राण की उत्पत्ति आकाश, जल और वायु से हुई है।
 
Skin, leather, flesh, blood, fat, marrow and bones – these seven elements of the body are made from earth, water and fire, while life has originated from sky, water and air.
तात्पर्य
समस्त भौतिक जगत् की रचना में विशेष रूप से तीन तत्वों का योगदान है, अर्थात् पृथ्वी, जल और अग्नि। किंतु चैतन्य तत्व आकाश, वायु और जल के द्वारा उत्पन्न होता है। इस प्रकार समस्त भौतिक निर्माण के स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों में जल एक सामान्य तत्व है। और यह ध्यान देने योग्य है कि आवश्यकता के कारण जल भौतिक निर्माण में सर्वाधिक प्रमुख तत्व होता है और अन्य पाँचों तत्वों का प्रमुख तत्व है। यह भौतिक शरीर पाँच तत्वों का समावेश है और विशेष रूप से तीन तत्वों, अर्थात् पृथ्वी, जल और आकाश के कारण ही स्थूल प्रकट होता है। स्पर्श की अनुभूति त्वचा पर बनी हुई एक पतली परत के कारण होती है और अस्थि कठोर पत्थर के समान है। जीवंत वायु आकाश, वायु और जल से निर्मित होती है और इसलिए खुली हवा, नियमित स्नान और रहने के लिए पर्याप्त स्थान स्वस्थ जीवन के लिए अनुकूल होता है। पृथ्वी से प्राप्त ताजी उपज, जैसे कि अनाज और सब्जियाँ, साथ ही ताजा पानी और ऊष्मा, स्थूल शरीर को बनाए रखने के लिए अच्छा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)