श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.10.30 
निदिध्यासोरात्ममायां हृदयं निरभिद्यत ।
ततो मनश्चन्द्र इति सङ्कल्प: काम एव च ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
जब उनकी अपनी शक्ति की गतिविधियों के बारे में सोचने की इच्छा जगी तो हृदय (मन का स्थान), मन, चंद्रमा, संकल्प और सभी इच्छाएँ प्रकट हुईं।
 
जब उनकी अपनी शक्ति की गतिविधियों के बारे में सोचने की इच्छा जगी तो हृदय (मन का स्थान), मन, चंद्रमा, संकल्प और सभी इच्छाएँ प्रकट हुईं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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