श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.10.28 
आसिसृप्सो: पुर: पुर्या नाभिद्वारमपानत: ।
तत्रापानस्ततो मृत्यु: पृथक्त्वमुभयाश्रयम् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, जब उन्हें एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने की इच्छा हुई, तो नाभि और मृत्यु की वायु का एक साथ निर्माण हुआ। नाभि मृत्यु और अपान वायु, दोनों का ही आश्रयस्थल है।
 
इसके बाद, जब उन्हें एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने की इच्छा हुई, तो नाभि और मृत्यु की वायु का एक साथ निर्माण हुआ। नाभि मृत्यु और अपान वायु, दोनों का ही आश्रयस्थल है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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