उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् ।
तत: पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रय: ॥ २७ ॥
अनुवाद
इसके बाद जब उन्हें खाए हुए खाने का मल निकालने की इच्छा हुई तब गुदा द्वार और पायु- इन्द्रिय और उनके अधिष्ठाता देव मित्र विकसित हो गए। पायु इन्द्रिय तथा उत्सर्जित होने वाला पदार्थ दोनों ही अधिष्ठाता देव की आज्ञा के अधीन हैं।
Subsequently, when they had the desire to defecate the food they had eaten, the anus and then the legs and their presiding deity Mitra developed. Both the senses and the emitted substances remain under the shelter of the presiding deity.
तात्पर्य
मल-मूत्र के त्याग तक अपमार्जित रहते हैं, तो जीव स्वतंत्र होने का दावा कैसे करे?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥