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श्लोक 2.10.27  |
उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् ।
तत: पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रय: ॥ २७ ॥ |
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| अनुवाद |
| इसके बाद जब उन्हें खाए हुए खाने का मल निकालने की इच्छा हुई तब गुदा द्वार और पायु- इन्द्रिय और उनके अधिष्ठाता देव मित्र विकसित हो गए। पायु इन्द्रिय तथा उत्सर्जित होने वाला पदार्थ दोनों ही अधिष्ठाता देव की आज्ञा के अधीन हैं। |
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| इसके बाद जब उन्हें खाए हुए खाने का मल निकालने की इच्छा हुई तब गुदा द्वार और पायु- इन्द्रिय और उनके अधिष्ठाता देव मित्र विकसित हो गए। पायु इन्द्रिय तथा उत्सर्जित होने वाला पदार्थ दोनों ही अधिष्ठाता देव की आज्ञा के अधीन हैं। |
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