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श्लोक 2.10.26  |
निरभिद्यत शिश्नो वै प्रजानन्दामृतार्थिन: ।
उपस्थ आसीत् कामानां प्रियं तदुभयाश्रयम् ॥ २६ ॥ |
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| अनुवाद |
| तदनंतर काम-सुख, सन्तानोत्पत्ति और स्वर्गीय अमृत सुख का आनंद लेने के लिए भगवान ने जननेन्द्रियाँ उत्पन्न कीं। इस प्रकार जननेन्द्रिय और उसके अधिष्ठाता देव प्रजापति प्रकट हुए। कामेच्छा के सुख की वस्तु और उसके अधिष्ठाता देव, भगवान की जननेन्द्रियों के अधीन हैं। |
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| तदनंतर काम-सुख, सन्तानोत्पत्ति और स्वर्गीय अमृत सुख का आनंद लेने के लिए भगवान ने जननेन्द्रियाँ उत्पन्न कीं। इस प्रकार जननेन्द्रिय और उसके अधिष्ठाता देव प्रजापति प्रकट हुए। कामेच्छा के सुख की वस्तु और उसके अधिष्ठाता देव, भगवान की जननेन्द्रियों के अधीन हैं। |
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