हस्तौ रुरुहतुस्तस्य नानाकर्मचिकीर्षया ।
तयोस्तु बलवानिन्द्र आदानमुभयाश्रयम् ॥ २४ ॥
अनुवाद
इसके बाद जब परम पुरुष ने विभिन्न प्रकार के कार्य करने की इच्छा की, तो दो हाथ और उन्हें नियंत्रित करने की शक्ति, और स्वर्ग के देवता इंद्र, और साथ ही दोनों हाथों और देवता पर निर्भर कार्य भी प्रकट हुए।
Thereafter when the Supreme Being desired to perform various tasks, two hands and their controlling power and the God of heaven Indra along with the tasks dependent on the two hands and the God also appeared.
तात्पर्य
प्रत्येक वस्तु मे यह लाभदायक बात देखने को मिल जाती है कि किसी भी स्थिति मे जीव की ज्ञानेन्द्रियां स्वतंत्र नहीं होती हैं। भगवान को इंद्रियों का स्वामी (हृषीकेश) कहते हैं। इसलिए जीव की ज्ञानेन्द्रियाँ भगवान की इच्छा से प्रकट होती हैं और प्रत्येक इंद्रिय किसी निश्चित प्रकार के देवता के नियंत्रण मे होती है। इसलिए कोई भी इंद्रियों का स्वामी होने का दावा नहीं कर सकता। जीव इंद्रियों के नियंत्रण मे होता है, इंद्रियाँ देवताओं के नियंत्रण मे होती हैं और देवता परमेश्वर के सेवक होते हैं। सृष्टि-प्रणाली मे व्यवस्था यही है। अंततः सभी पर नियंत्रण परमेश्वर का होता है और न तो भौतिक प्रकृति और न ही जीव की कोई स्वतंत्रता होती है। इंद्रियों का स्वामी होने का दावा करने वाला भ्रमित जीव भगवान की बाहरी ऊर्जा के चंगुल मे होता है। जब तक कोई जीव अपने बीज सा जीवन लेकर अहंकार से भरा रहता है तब ऐसा समझना चाहिए कि वह भगवान की बाहरी ऊर्जा के कठोर नियंत्रण मे है और भ्रम (माया) के चंगुल से छुटकारे की बात बेमानी है, भले ही वह कितना भी खुद को मुक्त आत्मा क्यों न घोषित कर ले।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥