श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.10.19 
विवक्षोर्मुखतो भूम्नो वह्निर्वाग् व्याहृतं तयो: ।
जले चैतस्य सुचिरं निरोध: समजायत ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
जब परम पिता बोले तो मुँह से वाणी उभरी। फिर मुँह से देव अग्नि निर्मित हुए। पर जब वो जल में लेटे तब ये सब कार्य बंद पड़ गये।
 
When Param Purush wanted to speak, words resounded from his mouth. Then the presiding deity Agni was born from his mouth. But when he was sleeping in the water, all these activities were stopped.
तात्पर्य
विभिन्न इंद्रियों का धीरे-धीरे विकास कैसे होता है, इसकी खासियत उनके नियंत्रक देवताओं द्वारा समर्थित होती है। इसलिए, यह समझना होता है कि इंद्रियों के कार्य परम के इच्छा के अनुसार नियंत्रित होते हैं। इंद्रियाँ, मानो कि सशर्त आत्माओं को एक लाइसेंस दे रही हैं, जो परम भगवान द्वारा नियुक्त नियंत्रक देवता के नियंत्रण में उनका समुचित रूप से उपयोग करने वाले हैं। जो नियंत्रण विनियमों का उल्लंघन करता है, उसे जीवन के निचले स्तर पर गिराकर दंडित किया जाना होता है। उदाहरण के लिए, जिह्वा और उसके नियंत्रक देवता, वरुण पर विचार करें। जिह्वा खाने के लिए है, और मनुष्यों, जानवरों और पक्षियों में से प्रत्येक का अलग-अलग लाइसेंस के कारण अलग-अलग स्वाद होता है। मनुष्यों और सूअरों का स्वाद एक समान स्तर पर नहीं होता है। नियंत्रक देवता, हालाँकि, एक विशेष प्रकार के शरीर को पुरस्कार देता है या प्रमाणित करता है जब विशेष सजीव प्रकृति के विभिन्न प्रकारों के संदर्भ में एक स्वाद विकसित करता है। यदि मनुष्य सूअरों की तरह बिना भेदभाव के स्वाद विकसित करता है, तो नियंत्रक देवता निश्चित रूप से उसे अगले जीवन में सूअर के शरीर देने के लिए प्रमाणित है। सूअर किसी भी प्रकार का भोजन स्वीकार करता है, जिसमें मल भी शामिल है, और जिस मनुष्य ने इस तरह का अंधाधुंध स्वाद विकसित किया है, उसे अगले जीवन में अवनत जीवन के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसा जीवन भी भगवान की कृपा है क्योंकि सशर्त आत्मा एक विशेष प्रकार के भोजन को पूरी तरह से चखने के लिए ऐसे ही शरीर की कामना करती है। यदि मनुष्य को सूअर का शरीर मिलता है तो उसे भगवान की कृपा मानना ​​चाहिए क्योंकि भगवान ही सुविधा प्रदान करते हैं। मृत्यु के बाद अगला शरीर श्रेष्ठ नियंत्रण द्वारा दिया जाता है, न कि आँख बंद करके। इसलिए, मनुष्य को इस बात से सावधान रहना चाहिए कि अगले जन्म में उसे किस प्रकार का शरीर मिलने जा रहा है। अविवेक का एक गैर-जिम्मेदाराना जीवन जोखिम भरा है, और यही सभी धर्मग्रंथों की घोषणा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)