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श्लोक 2.10.18  |
मुखतस्तालु निर्भिन्नं जिह्वा तत्रोपजायते ।
ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| मुँह में तालू होने से जीभ विकसित हुई। फिर अलग-अलग तरह के स्वाद आए ताकि जीभ उनका स्वाद ले सके। |
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| मुँह में तालू होने से जीभ विकसित हुई। फिर अलग-अलग तरह के स्वाद आए ताकि जीभ उनका स्वाद ले सके। |
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