श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.10.15 
अन्त:शरीर आकाशात् पुरुषस्य विचेष्टत: ।
ओज: सहो बलं जज्ञे तत: प्राणो महानसु: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
महाविष्णु के दिव्य शरीर के भीतर स्थित आकाश सर्वप्रथम इंद्रिय बल यानी ज्ञानेंद्रियों की शक्ति, मानसिक बल यानी बुद्धि और स्मरण की शक्ति, और शारीरिक बल यानी क्रिया करने की शक्ति उत्पन्न करता है। इन सभी के साथ-साथ सम्पूर्ण जीवनी शक्ति (प्राण), का मूल स्रोत भी आकाश से ही उत्पन्न होता है।
 
महाविष्णु के दिव्य शरीर के भीतर स्थित आकाश सर्वप्रथम इंद्रिय बल यानी ज्ञानेंद्रियों की शक्ति, मानसिक बल यानी बुद्धि और स्मरण की शक्ति, और शारीरिक बल यानी क्रिया करने की शक्ति उत्पन्न करता है। इन सभी के साथ-साथ सम्पूर्ण जीवनी शक्ति (प्राण), का मूल स्रोत भी आकाश से ही उत्पन्न होता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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