श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.10.12 
द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।
यदनुग्रहत: सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को यह अच्छी तरह समझना चाहिए कि सभी भौतिक तत्व, कर्म, समय और गुण और इन सभी का भोग करने वाली जीवात्माएँ भगवान की कृपा से ही मौजूद हैं। जैसे ही वे उन पर ध्यान देना बंद कर देते हैं, वे सभी वस्तुएँ अस्तित्वहीन हो जाती हैं।
 
Man should understand well that all the physical elements, karma, time and qualities and the living beings who enjoy them exist only by the grace of God. All these things become non-existent as soon as they are ignored by Him.
तात्पर्य
जीवित सत्ताएँ समय, रूपों आदि भौतिक तत्वों का आनंद लेने वाले हैं, क्योंकि वे भौतिक प्रकृति पर शासन करना चाहते हैं। प्रभु सर्वोच्च आनंददाता हैं, और जीवित सत्ताएँ उनके आनंद में सहायता करने और इस प्रकार सभी के दिव्य आनंद में भाग लेने के लिए हैं। आनंद लेने वाले और आनंद दिए जाने वाले दोनों आनंद में भाग लेते हैं, लेकिन मायावी ऊर्जा से भ्रमित होकर, जीवित सत्ताएँ प्रभु की तरह आनंद लेने वाली बनना चाहती हैं, हालाँकि वे उस तरह के आनंद के लिए नहीं हैं। जीवों, जीवित सताओं का उल्लेख भगवद्-गीता में प्रभु के श्रेष्ठ प्रकृति या परा प्रकृति के रूप में किया गया है, और विष्णु पुराण में भी इसका उल्लेख किया गया है। इसलिए जीवित सत्ताएँ कभी भी पुरुष या वास्तविक आनंद लेने वाले नहीं होते हैं। जैसे, भौतिक दुनिया में जीवित सत्ता द्वारा आनंद लेने की भावना झूठी है। आध्यात्मिक दुनिया में जीवित सत्ताएँ मूल रूप से पवित्र हैं, और इसलिए वे सर्वोच्च प्रभु के आनंद में सहचर हैं। भौतिक दुनिया में जीवित सताओं के आनंद लेने की भावना उनके अपने कार्यों (कर्म) के कारण धीरे-धीरे प्रकृति के नियमों से मिट जाती है, और इस प्रकार मायावी ऊर्जा बाध्य आत्माओं के कानों में हुक्म देती है कि वे प्रभु के साथ एक हो जाएँ। यह मायावी ऊर्जा का अंतिम फंदा है। जब प्रभु की दया से अंतिम माया भी दूर हो जाती है, तो जीवित सत्ता फिर से अपने मूल स्थान पर प्रतिस्थापित हो जाती है और इस प्रकार वास्तव में मुक्त हो जाती है। भौतिक जंजीरों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए, प्रभु भौतिक दुनिया का निर्माण करते हैं, इसे कुछ समय के लिए बनाए रखते हैं (पिछले श्लोक में बताए अनुसार उनके माप के एक हजार वर्ष), और फिर अपनी इच्छा से इसे फिर से नष्ट कर देते हैं। इसलिए जीवित सत्ताएँ पूरी तरह से प्रभु की दया पर निर्भर हैं, और जब प्रभु की इच्छा होती है तो वैज्ञानिक सुधार द्वारा उनके सभी तथाकथित आनंद धूल में मिल जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)