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bhagavat 2.10.11: परम पुरुष निराकार नहीं हैं, बल्कि एक स्पष्ट नर या मनुष्य हैं। इसलिए, सर्वश्रेष्ठ नर द्वारा निर्मित दिव्य जल को "नार" कहा जाता है। और चूँकि वे इसी जल में लेटे रहते हैं, इसलिए उन्हें नारायण कहा जाता है।   |   bhagavat अध्याय 2.10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है   ।   bhagavat स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.10.11 
तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रंपरिवत्सरान् ।
तेन नारायणो नाम यदाप: पुरुषोद्भवा: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
परम पुरुष निराकार नहीं हैं, बल्कि एक स्पष्ट नर या मनुष्य हैं। इसलिए, सर्वश्रेष्ठ नर द्वारा निर्मित दिव्य जल को "नार" कहा जाता है। और चूँकि वे इसी जल में लेटे रहते हैं, इसलिए उन्हें नारायण कहा जाता है।
 
The Supreme Being is not formless, hence He is clearly a man or male. That is why the divine water produced by this Supreme Being is called Nar. Since He sleeps in this water, He is called Narayan.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)