द्यौरक्षिणी चक्षुरभूत्पतङ्ग:
पक्ष्माणि विष्णोरहनी उभे च ।
तद्भ्रूविजृम्भ: परमेष्ठिधिष्ण्य-
मापोऽस्य तालु रस एव जिह्वा ॥ ३० ॥
अनुवाद
बाह्य अंतरिक्ष उसके नेत्रगोलक हैं और देखने की शक्ति सूर्य है। दिन और रात उसकी पलकें हैं और उसकी भौहों की गति में ब्रह्मा और अन्य महान व्यक्तित्व निवास करते हैं। जल का अधिपति वरुण उसका तालु है और सभी चीजों का सार उसकी जीभ है।
The outer space is his eye sockets and the sun is his eyeball for his power of vision. Day and night are his eyelids and in the movements of his eyebrows reside Brahma and other great souls. Varuna, the lord of waters, is his palate and the juice or essence of all things is his tongue.
तात्पर्य
व्यावहारिक बुद्धि के अनुसार इस श्लोक का वर्णन कुछ विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है क्योंकि कभी सूर्य का वर्णन नेत्र-गोलक से किया जाता है और कभी अंतरिक्ष क्षेत्र के गोले के रूप में। परंतु शास्त्रों के आदेशों में व्यावहारिक बुद्धि के लिए कोई स्थान नहीं है। हमको शास्त्रों के वर्णन को स्वीकार करना चाहिए और विराट-रूप पर व्यावहारिक बुद्धि से अधिक ध्यान देना चाहिए। व्यावहारिक बुद्धि हमेशा अपूर्ण होती है जबकि शास्त्रों का वर्णन हमेशा पूर्ण और त्रुटिहीन होता है। यदि कोई विसंगति है, तो वह हमारी अपूर्णता के कारण है, न कि शास्त्रों की। वैदिक ज्ञान प्राप्त करने की यही विधि है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥