सूत उवाच
इतीडितोऽर्चित: काममृषिणा भगवान् मुने ।
तथेति स स्मयन् प्रागाद् बदर्याश्रममीश्वर: ॥ ७ ॥
अनुवाद
सूत गोस्वामी ने कहा: हे विद्वान शौनक, मार्कण्डेय की स्तुति और पूजा से परम प्रसन्न हुए भगवान श्री नारायण मुस्कुराए और उत्तर दिया, "ऐसा ही हो।" इसके बाद वह बद्रीकाश्रम स्थित अपनी कुटिया के लिए प्रस्थान कर गए।
Suta Goswami said: O learned Shaunaka, thus pleased by the praise and worship of Mārkaṇḍeya, the Lord smilingly replied, "So be it," and then went to His hut at Badarikaṣrama.
तात्पर्य
इस पद में भगवान और ईश्वर शब्द भगवान को नर तथा नारायण ऋषि के अवतार को बताते हैं. विस्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, भगवान मंद-मंद मुस्कुराए क्योंकि उनकी इच्छा है कि उनके भक्त उनकी मायावी उर्जा से दूर रहें. भगवान की मायावी उर्जा को देखने की इच्छा कभी-कभी पापपूर्ण भौतिक इच्छा में बदल जाती है. लेकिन, अपने भक्त मार्कण्डेय को प्रसन्न करने के लिए, भगवान ने उनके अनुरोध को पूरा किया जैसे एक पिता अपने बेटे की हानिकारक इच्छा को रोक नहीं पाया और उसे इसका अनुभव करने देता है ताकि वो स्वेच्छा से पीछे हट जाए. इसलिए, भगवान जानते थे कि जल्दी ही मार्कण्डेय के साथ क्या घटेगा, इसलिए वे मुस्कुराए और उन्हें मायावी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए तैयार हो गए.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥