श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 9: मार्कण्डेय ऋषि को भगवान् की मायाशक्ति के दर्शन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.9.6 
अथाप्यम्बुजपत्राक्ष पुण्यश्लोकशिखामणे ।
द्रक्ष्ये मायां यया लोक: सपालो वेद सद्भ‍िदाम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
हे कमलनयन प्रभु, हे प्रसिद्ध व्यक्तित्वों के शिखर पुरुष, यद्यपि मैं केवल आपको देखकर ही संतुष्ट हूँ, फिर भी मैं आपकी मायाशक्ति को देखना चाहता हूँ जिसके प्रभाव से पूरा संसार और उसके अधिष्ठाता देवता भी सत्य को भौतिक दृष्टिकोण से विविध मानते हैं।
 
O lotus-eyed one, O chief of all illustrious men, although I am satisfied merely by seeing You, yet I desire to see Your illusory power, by whose influence the entire universe and its presiding demigods perceive the Truth to be diverse from the material point of view.
तात्पर्य
एक शर्त लगाई हुई आत्मा भौतिक संसार को स्वतंत्र, अलग-अलग संस्थाओं से मिलकर बना हुआ देखती है। वास्तव में, सभी चीजें एकजुट हैं, जो सर्वोच्च भगवान की शक्तियां हैं। मार्कंडेय ऋषि उस सटीक प्रक्रिया को देखने के लिए जिज्ञासु हैं जिसके द्वारा माया, भगवान की विस्मयकारी शक्ति, जीवित प्राणियों को भ्रम में डाल देती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)