वयं ते परितुष्टा: स्म त्वद् बृहद्व्रतचर्यया ।
वरं प्रतीच्छ भद्रं ते वरदोऽस्मि त्वदीप्सितम् ॥ ३ ॥
अनुवाद
तुम्हारा आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत हमें बहुत पसंद आया है। अब जो भी वरदान तुम चाहो, मांग लो क्योंकि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण कर सकता हूं। तुम सभी सौभाग्य से युक्त हो जाओ।
We are completely satisfied with your lifelong vow of celibacy. Now choose any boon you want because I can fulfill your wish. Enjoy all the good fortune.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि भगवान ने इस श्लोक की शुरुआत में बहुवचन रूप का उपयोग किया - "हम संतुष्ट हैं" - क्योंकि वह शिव और उमा के साथ खुद का उल्लेख कर रहे थे, जिन्हें बाद में मार्कण्डेय द्वारा महिमामंडित किया जाएगा। भगवान ने तब एकवचन का उपयोग किया - "मैं वरों का दाता हूं" - क्योंकि अंततः केवल भगवान नारायण (कृष्ण) ही जीवन की सर्वोच्च पूर्णता, शाश्वत कृष्ण चेतना प्रदान कर सकते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥