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bhagavat 12.8.7-11: अपने पिता द्वारा ब्राह्मण दीक्षा के लिए किए गए आवश्यक अनुष्ठानों से शुद्ध होने के बाद, मार्कण्डेय ने वैदिक मंत्रों का अध्ययन किया और नियमों का कड़ाई से पालन किया। वह तपस्या और वैदिक ज्ञान में आगे बढ़े और जीवन भर ब्रह्मचारी रहे। अपनी जटाओं और छाल के बने वस्त्रों में अत्यंत शांत दिखते हुए, उन्होंने अपनी आध्यात्मिक प्रगति को योगी के कमंडल, दंड, जनेऊ, ब्रह्मचारी पेटी, काले मृग-चर्म, कमल के बीज की जपमाला और कुश के समूह को धारण करके और आगे बढ़ाया। उन्होंने दिन के संधियों में भगवान के पाँच रूपों-यज्ञ-अग्नि, सूर्य, गुरु, ब्राह्मण और उनके हृदय के भीतर परमात्मा की नियमित पूजा की। वे सुबह और शाम को भिक्षा माँगने जाते थे और लौटने पर सारा एकत्रित भोजन अपने गुरु को भेंट कर देते थे। जब गुरु उन्हें आमंत्रित करते, तभी वे मौन भाव से दिन में एक बार भोजन करते थे, अन्यथा उपवास करते थे। इस प्रकार तपस्या और वैदिक अध्ययन में समर्पित मार्कण्डेय ऋषि ने इंद्रियों के परम स्वामी भगवान की करोड़ों वर्षों तक पूजा की और इस तरह उन्होंने दुर्जेय मृत्यु को जीत लिया।   |   bhagavat अध्याय 12.8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति  »  श्लोक 7-11
 
 
श्लोक  12.8.7-11 
प्राप्तद्विजातिसंस्कारो मार्कण्डेय: पितु: क्रमात् ।
छन्दांस्यधीत्य धर्मेण तप:स्वाध्यायसंयुत: ॥ ७ ॥
बृहद्‌व्रतधर: शान्तो जटिलो वल्कलाम्बर: ।
बिभ्रत् कमण्डलुं दण्डमुपवीतं समेखलम् ॥ ८ ॥
कृष्णाजिनं साक्षसूत्रं कुशांश्च नियमर्द्धये ।
अग्‍न्यर्कगुरुविप्रात्मस्वर्चयन् सन्ध्ययोर्हरिम् ॥ ९ ॥
सायं प्रात: स गुरवे भैक्ष्यमाहृत्य वाग्यत: ।
बुभुजे गुर्वनुज्ञात: सकृन्नो चेदुपोषित: ॥ १० ॥
एवं तप:स्वाध्यायपरो वर्षाणामयुतायुतम् ।
आराधयन् हृषीकेशं जिग्ये मृत्युं सुदुर्जयम् ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
अपने पिता द्वारा ब्राह्मण दीक्षा के लिए किए गए आवश्यक अनुष्ठानों से शुद्ध होने के बाद, मार्कण्डेय ने वैदिक मंत्रों का अध्ययन किया और नियमों का कड़ाई से पालन किया। वह तपस्या और वैदिक ज्ञान में आगे बढ़े और जीवन भर ब्रह्मचारी रहे। अपनी जटाओं और छाल के बने वस्त्रों में अत्यंत शांत दिखते हुए, उन्होंने अपनी आध्यात्मिक प्रगति को योगी के कमंडल, दंड, जनेऊ, ब्रह्मचारी पेटी, काले मृग-चर्म, कमल के बीज की जपमाला और कुश के समूह को धारण करके और आगे बढ़ाया। उन्होंने दिन के संधियों में भगवान के पाँच रूपों-यज्ञ-अग्नि, सूर्य, गुरु, ब्राह्मण और उनके हृदय के भीतर परमात्मा की नियमित पूजा की। वे सुबह और शाम को भिक्षा माँगने जाते थे और लौटने पर सारा एकत्रित भोजन अपने गुरु को भेंट कर देते थे। जब गुरु उन्हें आमंत्रित करते, तभी वे मौन भाव से दिन में एक बार भोजन करते थे, अन्यथा उपवास करते थे। इस प्रकार तपस्या और वैदिक अध्ययन में समर्पित मार्कण्डेय ऋषि ने इंद्रियों के परम स्वामी भगवान की करोड़ों वर्षों तक पूजा की और इस तरह उन्होंने दुर्जेय मृत्यु को जीत लिया।
 
Purified by the rituals prescribed by his father for receiving brahmanic initiation, Mārkaṇḍeya studied the Vedic hymns and strictly observed the rites. He advanced in austerities and Vedic knowledge and remained a celibate all his life. Appearing very serene from his matted hair and his clothes made of bark, he furthered his spiritual progress by wearing the yogi's kamandalu, staff, sacred thread, brahmacārī belt, black deerskin, lotus seed beads and a bundle of kuṣa. He regularly worshipped the five forms of the Lord at the twilight of the day—the sacrificial fire, the sun, the guru, the brahmana, and the Supersoul within his heart. He went out begging in the morning and evening and on his return offered all the food he had collected to his guru. He ate once a day in silence only when the guru invited him, otherwise he fasted. Thus the sage Mārkaṇḍeya, devoted to austerity and Vedic studies, worshipped the Supreme Lord, the Lord of the senses, for millions of years and thus conquered the formidable death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)