श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  12.8.49 
यद्दर्शनं निगम आत्मरह:प्रकाशं
मुह्यन्ति यत्र कवयोऽजपरा यतन्त: ।
तं सर्ववादविषयप्रतिरूपशीलं
वन्दे महापुरुषमात्मनिगूढबोधम् ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे प्रभु, केवल वैदिक ग्रंथ ही आपके परम स्वरूप से संबंधित ज्ञान को प्रकट करते हैं, इसलिए भगवान ब्रह्मा जैसे महान विद्वान भी इंद्रिय-निर्भर साधनों से आपको समझने की कोशिश में परेशान हो जाते हैं। प्रत्येक दार्शनिक आपको अपने विशिष्ट विचारों के द्वारा समझता है। मैं उस परम पुरुष की पूजा करता हूं, जिनका ज्ञान बद्ध आत्माओं की आध्यात्मिक पहचान को ढकने वाली शारीरिक पहचान से छिपा हुआ है।
 
O Lord, the Vedic scriptures alone reveal the secret knowledge of Your supreme nature, so even great scholars like Lord Brahma are bewildered in their attempt to understand You by inductive methods. Every philosopher understands You according to his particular philosophical conclusion. I worship the Supreme Being whose knowledge is concealed by the bodily titles that cover the spiritual nature of conditioned souls.
तात्पर्य
भगवान ब्रह्मा जैसे महान देवता भी भगवान के रहस्यों को समझने की अपनी प्रयासों में हतप्रभ हो जाते हैं। हर दार्शनिक प्रकृति के तीनों गुणों के एक अद्वितीय संयोजन से ढका है और इस प्रकार वह भगवान को अपनी भौतिक स्थिति के अनुसार ही समझाता है। इसलिए, यहाँ तक कि कठिन वैज्ञानिक प्रयास भी कभी भी ज्ञान की प्राप्ति की परिणति तक नहीं ले जा सकते। सर्वोच्च ज्ञान कृष्ण, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है और कोई उन्हें तभी समझ सकता है जब वह पूरी तरह से उनके प्रति समर्पित हो जाए और अपने प्रेम से उनकी सेवा करे। इसलिए यहाँ माँडकेय ऋषि कहते हैं "वन्दे महापुरुषम": "मैं बस उस सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा करता हूँ।" वो लोग जो भगवान की पूजा करने का प्रयास करते हैं लेकिन साथ ही सिर्फ़ अटकलें लगाते रहते हैं या फलस्वरूप कार्य करते रहते हैं, उन्हें सिर्फ़ मिश्रित और भ्रमित करने वाले परिणाम ही प्राप्त होंगे। एक शुद्ध भक्त के लिए ज़रूरी होता है कि वो सभी फलकारी गतिविधियों और मानसिक अटकलों को छोड़ दे इसके बाद ही भगवान के प्रति उसकी भक्तिपूर्ण सेवा से सर्वोच्च के बारे में परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो सकता है। केवल ये पूर्णता ही शाश्वत आत्मा को संतुष्ट कर सकती है।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध बारह के अंतर्गत आठवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)