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bhagavat 12.8.47: मैं सर्वोच्च भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ। वे ब्रह्माण्ड में सर्वव्याप्त और सर्व समावेशी हैं और गुरु भी हैं। मैं ऋषि के रूप में प्रकट भगवान नारायण को नमन करता हूँ। मैं संतस्वभावी नर को भी नमन करता हूँ जो मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं, जो पूर्णतया सात्विक हैं, जिनकी वाणी नियंत्रित है और जो वैदिक साहित्य के प्रचारक हैं।   |   bhagavat अध्याय 12.8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.8.47 
तस्मै नमो भगवते पुरुषाय भूम्ने
विश्वाय विश्वगुरवे परदैवताय ।
नारायणाय ऋषये च नरोत्तमाय
हंसाय संयतगिरे निगमेश्वराय ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
मैं सर्वोच्च भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ। वे ब्रह्माण्ड में सर्वव्याप्त और सर्व समावेशी हैं और गुरु भी हैं। मैं ऋषि के रूप में प्रकट भगवान नारायण को नमन करता हूँ। मैं संतस्वभावी नर को भी नमन करता हूँ जो मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं, जो पूर्णतया सात्विक हैं, जिनकी वाणी नियंत्रित है और जो वैदिक साहित्य के प्रचारक हैं।
 
I offer my respectful obeisances unto that Supreme Personality of Godhead. He is the omnipresent and all-pervading being of the universe and also its Guru. I offer my obeisances unto Lord Narayana, the most revered God appearing in the form of a sage. I also offer my obeisances unto the saintly man, who is the best of men, who is completely Satvik, whose speech is restrained and who is the propagator of the Vedic scriptures.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)