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bhagavat 12.8.41: हे परमेश्वर, आपके ये दो मानव रूप तीनों लोकों को परम लाभ देने के लिए प्रकट हुए हैं - भौतिक दुख की समाप्ति और मृत्यु पर विजय। हे प्रभु, यद्यपि आप इस ब्रह्माण्ड की रचना करते हैं और इसकी रक्षा करने के लिए अनेक दिव्य रूप धारण करते हैं, परंतु आप इसका नाश भी करते हैं, जैसे कि एक मकड़ी पहले जाला बुनती है और बाद में उसे खा जाती है।   |   bhagavat अध्याय 12.8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.8.41 
मूर्ती इमे भगवतो भगवंस्त्रिलोक्या:
क्षेमाय तापविरमाय च मृत्युजित्यै ।
नाना बिभर्ष्यवितुमन्यतनूर्यथेदं
सृष्ट्वा पुनर्ग्रससि सर्वमिवोर्णनाभि: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
हे परमेश्वर, आपके ये दो मानव रूप तीनों लोकों को परम लाभ देने के लिए प्रकट हुए हैं - भौतिक दुख की समाप्ति और मृत्यु पर विजय। हे प्रभु, यद्यपि आप इस ब्रह्माण्ड की रचना करते हैं और इसकी रक्षा करने के लिए अनेक दिव्य रूप धारण करते हैं, परंतु आप इसका नाश भी करते हैं, जैसे कि एक मकड़ी पहले जाला बुनती है और बाद में उसे खा जाती है।
 
O Lord, these two material forms of Yours have appeared to bestow the ultimate benefit to the three worlds—the cessation of material suffering and the victory over death. O Lord, although You create this universe and assume various transcendental forms to protect it, You also swallow it up, just as a spider spins its web and then swallows it up.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)