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bhagavat 12.8.40: श्री मार्कण्डेय ने कहा: "हे सर्वशक्तिमान प्रभु, भला मैं आपका वर्णन कैसे कर सकता हूँ?" आप प्राणवायु को जागृत करते हैं, जो मन, इन्द्रियों तथा वाक्-शक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। यह सारे सामान्य बद्धजीवों पर, यहाँ तक कि ब्रह्मा तथा शिव जैसे महान् देवताओं पर भी, लागू होता है। अतएव यह निस्सन्देह, मेरे लिए भी सही है। तो भी, आप अपनी पूजा करने वालों के घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं।   |   bhagavat अध्याय 12.8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.8.40 
श्रीमार्कण्डेय उवाच
किं वर्णये तव विभो यदुदीरितोऽसु:
संस्पन्दते तमनु वाङ्‌मनइन्द्रियाणि ।
स्पन्दन्ति वै तनुभृतामजशर्वयोश्च
स्वस्याप्यथापि भजतामसि भावबन्धु: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
श्री मार्कण्डेय ने कहा: "हे सर्वशक्तिमान प्रभु, भला मैं आपका वर्णन कैसे कर सकता हूँ?" आप प्राणवायु को जागृत करते हैं, जो मन, इन्द्रियों तथा वाक्-शक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। यह सारे सामान्य बद्धजीवों पर, यहाँ तक कि ब्रह्मा तथा शिव जैसे महान् देवताओं पर भी, लागू होता है। अतएव यह निस्सन्देह, मेरे लिए भी सही है। तो भी, आप अपनी पूजा करने वालों के घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं।
 
Sri Mārkaṇḍeya said: “O Almighty Lord, how can I describe You?” You awaken the vital breath, which activates the mind, the senses and the power of speech. This applies to all ordinary conditioned souls, even to great demigods like Brahmā and Śiva. So it is, of course, true of me also. Still, You become the intimate friend of those who worship You.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)