श्रीशौनक उवाच
सूत जीव चिरं साधो वद नो वदतां वर ।
तमस्यपारे भ्रमतां नृणां त्वं पारदर्शन: ॥ १ ॥
अनुवाद
श्री शौनक ने कहा : हे सूत, आप दीर्घायु हों। हे साधु, हे वक्ता श्रेष्ठ, आप हमसे इसी तरह बोलते रहें। निःसंदेह, आप ही मनुष्यों को उस अज्ञान से निकलने का मार्ग दिखा सकते हैं जिसमें वे भटक रहे हैं।
Sri Saunaka said: O Suta, may you live long. O Sadhu, O great speaker, may you continue to speak to us in this manner. Indeed, only you can show men the path out of the ignorance in which they are wandering.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, ऋषियों ने देखा कि सूत गोस्वामी श्रीमद-भागवत कथा का अंत करने वाले हैं, और उन्होंने उनसे पहले मार्कंडेय ऋषि की कथा कहने का आग्रह किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥