श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 6: महाराज परीक्षित का निधन  »  श्लोक 54-56
 
 
श्लोक  12.6.54-56 
पैल: स्वसंहितामूचे इन्द्रप्रमितये मुनि: ।
बाष्कलाय च सोऽप्याह शिष्येभ्य: संहितां स्वकाम् ॥ ५४ ॥
चतुर्धा व्यस्य बोध्याय याज्ञवल्क्‍‍याय भार्गव ।
पराशरायाग्निमित्र इन्द्रप्रमितिरात्मवान् ॥ ५५ ॥
अध्यापयत् संहितां स्वां माण्डूकेयमृषिं कविम् ।
तस्य शिष्यो देवमित्र: सौभर्यादिभ्य ऊचिवान् ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
पैले ऋषि ने अपनी संहिता को दो भागों में विभाजित कर इंद्रप्रमति और बाष्कल को सिखाया। बाष्कल ने अपने संग्रह को चार भागों में विभाजित किया, हे भार्गव, और उन्हें अपने चार शिष्यों - बोध्य, याज्ञवल्क्य, पराशर और अग्निमित्र को पढ़ाया। आत्मसंयमी ऋषि इंद्रप्रमति ने अपनी संहिता विद्वान योगी माण्डूकेय को सिखाई, जिनके शिष्य देवमित्र ने आगे चलकर सौभरि और अन्य लोगों को ऋग्वेद के सभी विभाग सिखाए।
 
After dividing his Samhita into two parts, the learned Paila transmitted it to Indrapramiti and Bashkala. O Bhaargava, Bashkala again divided his collection into four parts and taught them to his four disciples—Bodhya, Yajnavalkya, Parashara and Agnimitra. The self-controlled sage Indrapramiti taught his Samhita to the learned Yogi Mandukeya, whose disciple Devamitra later transmitted all the divisions of the Rigveda to Saubhari and others.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी के अनुसार, माण्डूकेय इन्द्रप्रामिति के पुत्र थे, जिनसे उन्हें वैदिक ज्ञान प्राप्त हुआ था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)