श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 6: महाराज परीक्षित का निधन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.6.46 
ते परम्परया प्राप्तास्तत्तच्छिष्यैर्धृतव्रतै: ।
चतुर्युगेष्वथ व्यस्ता द्वापरादौ महर्षिभि: ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार चतुर्युग के समस्त चक्र में दृढ़व्रत शिष्यों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी ने परंपरागत रूप से प्राप्त इन वेदों को गुरु-शिष्यों की परंपरा को कायम रखा है। प्रत्येक द्वापर युग के अंत में प्रसिद्ध मुनिगण इन वेदों को पृथक विभागों में संपादित करते हैं।
 
In this way, in all the cycles of Chaturyuga, generation after generation of steadfast disciples received these Vedas through tradition. At the end of every Dwapar Yuga, famous sages edit these Vedas in separate sections.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)