नैष त्वया मनुष्येन्द्र वधमर्हति सर्पराट् ।
अनेन पीतममृतमथ वा अजरामर: ॥ २४ ॥
अनुवाद
"हे राजा, यह उचित नहीं है कि यह सर्पराज आपके हाथों मृत्यु को प्राप्त हो, क्योंकि इसे अमर देवताओं के अमृत का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है। इसके कारण इसे सामान्य रूप से बुढ़ापे और मृत्यु के लक्षणों का सामना नहीं करना पड़ता है।"
“O king of men, it is not proper that this King of Serpents should die at your hands because he has drunk the nectar of the immortal gods. As a result, he is not afflicted by the common symptoms of old age and death.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥