Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 12.5.8: शरीर के भीतर मौजूद आत्मा अपने आप में प्रकाशित है और उसे देखने वाले भौतिक शरीर और अदृश्य सूक्ष्म शरीर से अलग है। यह बदलते हुए शरीरों का स्थिर आधार बना रहता है, जैसे आकाश भौतिक परिवर्तन की अपरिवर्तनीय पृष्ठभूमि है। इसलिए, आत्मा अंतहीन है और भौतिक तुलना से परे है। | bhagavat अध्याय 12.5: महाराज परीक्षित को शुकदेव गोस्वामी का अन्तिम उपदेश । bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न तत्रात्मा स्वयंज्योतिर्यो व्यक्ताव्यक्तयो: पर: ।
आकाश इव चाधारो ध्रुवोऽनन्तोपमस्तत: ॥ ८ ॥
अनुवाद
शरीर के भीतर मौजूद आत्मा अपने आप में प्रकाशित है और उसे देखने वाले भौतिक शरीर और अदृश्य सूक्ष्म शरीर से अलग है। यह बदलते हुए शरीरों का स्थिर आधार बना रहता है, जैसे आकाश भौतिक परिवर्तन की अपरिवर्तनीय पृष्ठभूमि है। इसलिए, आत्मा अंतहीन है और भौतिक तुलना से परे है।
The soul within the body is self-illuminated and distinct from the visible gross and invisible subtle bodies. It remains the stable support of the changing bodies, just as space is the unchanging background of physical transformation. The soul is therefore eternal and beyond physical comparison.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥