न भविष्यसि भूत्वा त्वं पुत्रपौत्रादिरूपवान् ।
बीजाङ्कुरवद् देहादेर्व्यतिरिक्तो यथानल: ॥ ३ ॥
अनुवाद
तुम अपने पुत्रों और पौत्रों में फिर से जन्म नहीं लोगे, ठीक जैसे बीज से अंकुर जन्म लेता है और फिर एक नया बीज बनाता है। इसके बजाय, तुम भौतिक शरीर और उसके अंगों से पूरी तरह से अलग हो, जैसे आग अपने ईंधन से भिन्न होती है।
You will not be reborn as your sons and grandsons, as a sprout sprouts from a seed and again becomes a new seed. Rather, you are completely different from the physical body and its accessories, just as fire is different from its fuel.
तात्पर्य
कभी-कभी कोई अपने पुत्र के पुत्र के रूप में पुनर्जन्म लेने का सपना देखता है, उसी भौतिक परिवार में सदैव रहने की आशा में। श्रुति-मंत्र में कहा गया है, पिता पुत्रेण पितृमान योनि-योनाउ: "एक पिता का अपने पुत्र में एक पिता होता है, क्योंकि वह अपने ही पौत्र के रूप में जन्म ले सकता है।" श्रीमद-भागवतम का उद्देश्य आध्यात्मिक मुक्ति है, न कि शारीरिक पहचान के भ्रम को मूर्खता से लम्बा करना। इस श्लोक में इसका स्पष्ट उल्लेख है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥