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श्लोक 12.5.2  |
त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि ।
न जात: प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नङ्क्ष्यसि ॥ २ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन, "मैं मरने वाला हूँ" ऐसा सोचने की पशुवत प्रवृत्ति को त्याग दो। तुम शरीर से बिलकुल भिन्न हो क्योंकि तुमने जन्म नहीं लिया है। बीते समय में ऐसा कोई काल नहीं था जब तुम नहीं थे और तुमका विनाश होने वाला भी नहीं है। |
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| हे राजन, "मैं मरने वाला हूँ" ऐसा सोचने की पशुवत प्रवृत्ति को त्याग दो। तुम शरीर से बिलकुल भिन्न हो क्योंकि तुमने जन्म नहीं लिया है। बीते समय में ऐसा कोई काल नहीं था जब तुम नहीं थे और तुमका विनाश होने वाला भी नहीं है। |
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