श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.4.29 
विकार: ख्यायमानोऽपि प्रत्यगात्मानमन्तरा ।
न निरूप्योऽस्त्यणुरपि स्याच्चेच्चित्सम आत्मवत् ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
भौतिक दृष्टि से, पृथ्वी पर भौतिक रूप से दिखाई देने वाले किसी भी परमाणु का बदलता रूप, तब तक कोई विशेष महत्व नहीं रखता, जब तक उसका संबंध परमात्मा से न जोड़ा जाए। किसी भी वस्तु को वास्तव में मौजूद मानने के लिए, उसे शुद्ध आत्मा जैसा गुण होना चाहिए, जैसे कि वह अनंत और अपरिवर्तनीय है।
 
Any transformation experienced by even a single atom of material nature has no ultimate meaning without reference to the Supreme Being. For something to truly exist, it must have the same quality as pure Self—eternal and indestructible.
तात्पर्य
रेगिस्तान में दिखने वाला मृगतृष्णा का पानी वास्तव में प्रकाश की एक अभिव्यक्ति है; पानी की गलत उपस्थिति प्रकाश का एक विशिष्ट परिवर्तन है। जो कि भ्रामक रूप से स्वतंत्र भौतिक प्रकृति के रूप में प्रकट होता है वह भी भगवान का एक रूपांतरण है। भौतिक प्रकृति ईश्वर की बाहरी शक्ति है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)