श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.4.28 
यत् सामान्यविशेषाभ्यामुपलभ्येत स भ्रम: ।
अन्योन्यापाश्रयात् सर्वमाद्यन्तवदवस्तु यत् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
सामान्य कारण और विशिष्ट प्रभाव के रूप में अनुभव की गई कोई भी चीज़ भ्रम होनी चाहिए क्योंकि ऐसे कारण और प्रभाव केवल एक-दूसरे के सापेक्ष मौजूद होते हैं। निस्संदेह, जिसका भी आरंभ और अंत है, वह असत्य है।
 
Anything experienced as a general cause and a specific effect must be an illusion because such causes and effects are relative to each other. Indeed, anything that has a beginning and an end is false.
तात्पर्य
किसी भौतिक कारण की वास्तविकता उसकी घटनाओं को देखे बिना नहीं देखी जा सकती। उदाहरण के लिए, आग की ज्वलनशील प्रकृति को उसकी घटनाओं को देखे बिना नहीं देखा जा सकता है जैसे कोई जलती हुई वस्तु या राख। उसी प्रकार, पानी की भीगी हुई तासीर को उसके कार्य को देखे बिना नहीं समझा जा सकता जैसे कोई भीगा हुआ कपड़ा या पेपर। मनुष्य की संगठनात्मक शक्ति को उसके सक्रिय कार्य के परिणाम, जैसे एक ठोस संस्था को देखे बिना नहीं समझा जा सकता। इस तरह, न केवल कार्य अपने कारणों पर निर्भर करते हैं, बल्कि कारण का अवलोकन भी उसके प्रभाव के अवलोकन पर निर्भर करता है। इस प्रकार दोनों सापेक्ष रूप से परिभाषित होते हैं और एक शुरुआत और अंत होता है। निष्कर्ष यह है कि सभी ऐसे भौतिक कारण और प्रभाव अनिवार्य रूप से अस्थायी और सापेक्ष हैं, और परिणामस्वरूप भ्रामक हैं।

भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, हालाँकि सभी कारणों का कारण हैं, उनका कोई आरंभ या अंत नहीं है। इसलिए वह न तो भौतिक है और न ही भ्रामक। भगवान कृष्ण की संपन्नता और क्षमताएँ पूर्ण वास्तविकता है, भौतिक कारण और प्रभाव की अन्योन्याश्रयता से परे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)