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bhagavat 12.4.26: बिल्कुल उसी तरह जिस प्रकार आकाश में बादल बनते हैं और फिर अपने मूल तत्वों के मिश्रण और विघटन से फैल जाते हैं, वैसे ही यह भौतिक ब्रह्मांड परम सत्य के भीतर अपने मूलभूत, घटक भागों के मिश्रण और विघटन से निर्मित और नष्ट होता रहता है।   |   bhagavat अध्याय 12.4: ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.4.26 
यथा जलधरा व्योम्नि भवन्ति न भवन्ति च ।
ब्रह्मणीदं तथा विश्वमवयव्युदयाप्ययात् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
बिल्कुल उसी तरह जिस प्रकार आकाश में बादल बनते हैं और फिर अपने मूल तत्वों के मिश्रण और विघटन से फैल जाते हैं, वैसे ही यह भौतिक ब्रह्मांड परम सत्य के भीतर अपने मूलभूत, घटक भागों के मिश्रण और विघटन से निर्मित और नष्ट होता रहता है।
 
Just as clouds form in the sky and then disperse by the mixing and merging of their constituent elements, so this physical universe is created and destroyed within the Supreme Brahman by the mixing and merging of its constituent elements.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)