Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 12.4.24: दीपक, उस दीपक के प्रकाश से देखने वाली आँख और दिखाई देने वाला दृश्य रूप, सभी मूल रूप से अग्नि तत्व से अलग नहीं हैं। ठीक उसी प्रकार, बुद्धि, इंद्रियाँ और ज्ञानेंद्रियों द्वारा होने वाली अनुभूतियाँ परम सत्य से पृथक नहीं होती, यद्यपि परम सत्य (अद्वैत) इनसे सर्वथा भिन्न होता है। | bhagavat अध्याय 12.4: ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ । bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
दीपश्चक्षुश्च रूपं च ज्योतिषो न पृथग् भवेत् ।
एवं धी: खानि मात्राश्च न स्युरन्यतमादृतात् ॥ २४ ॥
अनुवाद
दीपक, उस दीपक के प्रकाश से देखने वाली आँख और दिखाई देने वाला दृश्य रूप, सभी मूल रूप से अग्नि तत्व से अलग नहीं हैं। ठीक उसी प्रकार, बुद्धि, इंद्रियाँ और ज्ञानेंद्रियों द्वारा होने वाली अनुभूतियाँ परम सत्य से पृथक नहीं होती, यद्यपि परम सत्य (अद्वैत) इनसे सर्वथा भिन्न होता है।
The lamp, the eye that sees with the light of that lamp and the visible form are basically inseparable from the fire element. Similarly, the intellect, senses and sense experiences have no existence apart from the Supreme Truth, although that Supreme Truth (Parabrahma) is completely different from them.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥