Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 12.4.15-19: तब अग्नि जल का स्वाद छीन लेती है, और जल अपने अनूठे गुण, यानी स्वाद को छोड़कर अग्नि में विलीन हो जाता है। वायु अग्नि के भीतर बसे रूप को ले लेता है और फिर अग्नि अपना रूप खोकर वायु में समा जाती है। आकाश वायु के गुण यानी स्पर्श को ले लेता है और वायु आकाश में प्रवेश कर जाती है। इसके पश्चात्, हे राजन, तमोगुणी मिथ्या अहंकार आकाश के गुण यानी ध्वनि को ले लेता है, और उसके बाद आकाश मिथ्या अहंकार में समा जाता है। रजोगुणी मिथ्या अहंकार इंद्रियों को अपने कब्जे में ले लेता है, और सतोगुणी मिथ्या अहंकार देवताओं को अवशोषित कर लेता है। फिर संपूर्ण महान तत्त्व अपनी विविध क्षमताओं समेत मिथ्या अहंकार को अपने कब्जे में ले लेता है, और यह महान तत्त्व प्रकृति के तीन मुख्य गुणों—सत्व, रज और तम—के द्वारा जकड़ लिया जाता है। हे राजा परीक्षित, ये गुण समय के प्रभाव से उकसाई गई प्रकृति के मूल अव्यक्त रूप के द्वारा फिर अपने कब्जे में ले लिए जाते हैं। यह अव्यक्त प्रकृति समय के प्रभाव से होने वाले छह प्रकार के बदलावों के अधीन नहीं होती, बल्कि, इसका कोई आदि नहीं है और कोई अंत भी नहीं है। यह सृष्टि का अव्यक्त, शाश्वत और अचूक कारण है। | bhagavat अध्याय 12.4: ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ । bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अपां रसमथो तेजस्ता लीयन्तेऽथ नीरसा: ।
ग्रसते तेजसो रूपं वायुस्तद्रहितं तदा ॥ १५ ॥
लीयते चानिले तेजो वायो: खं ग्रसते गुणम् ।
स वै विशति खं राजंस्ततश्च नभसो गुणम् ॥ १६ ॥
शब्दं ग्रसति भूतादिर्नभस्तमनुलीयते ।
तैजसश्चेन्द्रियाण्यङ्ग देवान् वैकारिको गुणै: ॥ १७ ॥
महान् ग्रसत्यहङ्कारं गुणा: सत्त्वादयश्च तम् ।
ग्रसतेऽव्याकृतं राजन् गुणान् कालेन चोदितम् ॥ १८ ॥
न तस्य कालावयवै: परिणामादयो गुणा: ।
अनाद्यनन्तमव्यक्तं नित्यं कारणमव्ययम् ॥ १९ ॥
अनुवाद
तब अग्नि जल का स्वाद छीन लेती है, और जल अपने अनूठे गुण, यानी स्वाद को छोड़कर अग्नि में विलीन हो जाता है। वायु अग्नि के भीतर बसे रूप को ले लेता है और फिर अग्नि अपना रूप खोकर वायु में समा जाती है। आकाश वायु के गुण यानी स्पर्श को ले लेता है और वायु आकाश में प्रवेश कर जाती है। इसके पश्चात्, हे राजन, तमोगुणी मिथ्या अहंकार आकाश के गुण यानी ध्वनि को ले लेता है, और उसके बाद आकाश मिथ्या अहंकार में समा जाता है। रजोगुणी मिथ्या अहंकार इंद्रियों को अपने कब्जे में ले लेता है, और सतोगुणी मिथ्या अहंकार देवताओं को अवशोषित कर लेता है। फिर संपूर्ण महान तत्त्व अपनी विविध क्षमताओं समेत मिथ्या अहंकार को अपने कब्जे में ले लेता है, और यह महान तत्त्व प्रकृति के तीन मुख्य गुणों—सत्व, रज और तम—के द्वारा जकड़ लिया जाता है। हे राजा परीक्षित, ये गुण समय के प्रभाव से उकसाई गई प्रकृति के मूल अव्यक्त रूप के द्वारा फिर अपने कब्जे में ले लिए जाते हैं। यह अव्यक्त प्रकृति समय के प्रभाव से होने वाले छह प्रकार के बदलावों के अधीन नहीं होती, बल्कि, इसका कोई आदि नहीं है और कोई अंत भी नहीं है। यह सृष्टि का अव्यक्त, शाश्वत और अचूक कारण है।
Then fire acquires taste from water, which, giving up its unique quality of taste, merges into fire. Air acquires the form inherent in fire, and then fire, losing its form, dissolves into air. Space acquires the quality of air, touch, and that air enters space. Then, O king, the false ego in the mode of tam assumes the quality of sound, the quality of space, after which space merges into the false ego. The false ego in the mode of rajos assumes the senses, and the ego in the mode of sattva absorbs the demigods. Then the entire mahat element assumes the false ego with its various functions, and this mahat is grasped by the three modes of nature—sato, rajo, and tamo. These modes, O king Parikshit, are taken over by the original unmanifested form of nature, induced by time. This unmanifested nature is not subject to the six kinds of modifications produced by the influence of time, but has neither beginning nor end. This is the unmanifest, eternal and indestructible cause of creation.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥