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bhagavat 12.3.5: ये घमंडी राजा मेरे तल पर सारी जमीन को जीत लेने के बाद, समुद्र को जीतने की कोशिश में ज़बरदस्ती समुद्र में उतरते हैं। उनका यह आत्मसंयम, जिसका लक्ष्य है राजनीतिक शोषण, क्या काम का है? आत्मसंयम का असली उद्देश्य आत्मिक मुक्ति है।   |   bhagavat अध्याय 12.3: भूमि गीत   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 3: भूमि गीत  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.3.5 
समुद्रावरणां जित्वा मां विशन्त्यब्धिमोजसा ।
कियदात्मजयस्यैतन्मुक्तिरात्मजये फलम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
ये घमंडी राजा मेरे तल पर सारी जमीन को जीत लेने के बाद, समुद्र को जीतने की कोशिश में ज़बरदस्ती समुद्र में उतरते हैं। उनका यह आत्मसंयम, जिसका लक्ष्य है राजनीतिक शोषण, क्या काम का है? आत्मसंयम का असली उद्देश्य आत्मिक मुक्ति है।
 
“These proud kings, after conquering all the land on my surface, force their way into the sea to conquer it. What good is their self-restraint, which aims at political exploitation? The real aim of self-restraint is spiritual liberation.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)