गृहस्थ भिखारियों के संबंध में, जब भगवान के भक्त प्रचार साहित्य वितरित करते हुए घर-घर जाते हैं और ईश्वर की महिमा के प्रचार के लिए दान का अनुरोध करते हैं, तो चिढ़े हुए गृहस्थ आमतौर पर जवाब देते हैं, "मुझे कोई दान दे।" कलियुग में गृहस्थ दानशील नहीं हैं। इसके बजाय, अपनी कंजूस मानसिकता के कारण, जब आध्यात्मिक भिखारी उनके पास आते हैं तो वे चिढ़ जाते हैं।
वैदिक संस्कृति में, पचास वर्ष की आयु में, जोड़े पवित्र स्थानों पर तपस्वी जीवन और आध्यात्मिक पूर्णता के लिए सेवानिवृत्त हो जाते हैं। हालाँकि, अमेरिका जैसे देशों में, सेवानिवृत्ति शहरों का निर्माण किया गया है जहाँ बुजुर्ग लोग अपने जीवन के अंतिम वर्षों को गोल्फ, पिंग-पोंग और शफलबोर्ड खेलने और प्रेम संबंधों में शामिल होकर बेवकूफ बना सकते हैं, जबकि उनके शरीर भयानक रूप से सड़ रहे हैं और उनके दिमाग कमजोर हो रहे हैं। जीवन के आदरणीय अंतिम वर्षों का यह बेशर्म दुरुपयोग मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य को स्वीकार करने की जिद्दी अनिच्छा को दर्शाता है और निश्चित रूप से ईश्वर के खिलाफ अपराध है।
'न्यासिनोऽत्यर्थ-लोलुपाः' शब्द इंगित करते हैं कि करिश्माई धार्मिक नेता, और यहां तक कि वे जो करिश्माई नहीं हैं, भोली जनता को धोखा देने और अपने बैंक खातों को मोटा करने के लिए खुद को नबी, संत और अवतार घोषित करेंगे। इसलिए इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस पूरी दुनिया के लिए वास्तविक ब्रह्मचारी छात्र जीवन, धार्मिक गृहस्थ जीवन, सम्मानजनक और प्रगतिशील सेवानिवृत्ति और वास्तविक आध्यात्मिक नेतृत्व स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। रियो डी जनेरियो, ब्राजील के कामुक शहर में, आज, 9 मई, 1982 को, हमने तीन युवाओं, दो ब्राजीलियाई और एक अमेरिकी को जीवन का त्यागपूर्ण क्रम संन्यास प्रदान किया है, इस ईमानदार आशा के साथ कि वे त्यागी जीवन की कठोर प्रतिज्ञाओं का ईमानदारी से पालन करेंगे और दक्षिण अमेरिका में प्रामाणिक आध्यात्मिक नेतृत्व प्रदान करेंगे।
