श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 3: भूमि गीत  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.3.32 
दस्यूत्कृष्टा जनपदा वेदा: पाषण्डदूषिता: ।
राजानश्च प्रजाभक्षा: शिश्न‍ोदरपरा द्विजा: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
शहर चोरों के आधिपत्य में आ जाएँगे, नास्तिकों की मनमानी व्याख्याओं से वेद दूषित हो जाएँगे, राजनीतिक नेता प्रजा का उपभोग करेंगे और तथाकथित पुरोहित व बुद्धिजीवी अपने पेट और संभोग के भक्त होंगे।
 
Cities will be full of thieves, the Vedas will be corrupted by arbitrary interpretations of atheists, political leaders will devour the people and the so-called priests and intellectuals will be devotees of their own stomachs and genitals.
तात्पर्य
रात के समय बड़े शहर असुरक्षित रहते हैं। उदाहरण के लिए, यह समझा जाता है कि कोई भी समझदार व्यक्ति रात के समय सेंट्रल पार्क में नहीं घूमेगा क्योंकि वह जानता है कि वहाँ पर उसे लगभग निश्चित रूप से लूट लिया जाएगा। साधारण चोरों के अलावा, जो इस युग में मौजूद हैं, बड़े शहर गलाकाट व्यापारियों से भरे हुए हैं, जो लोगों को उत्साहपूर्वक बेकार और नुकसानदायक उत्पादों को खरीदने और उनका उपभोग करने के लिए मनाते हैं। यह अच्छी तरह से प्रलेखित किया गया है कि बीफ, तंबाकू और कई अन्य आधुनिक उत्पाद किसी के शारीरिक स्वास्थ्य को नष्ट कर देते हैं, मानसिक स्वास्थ्य की तो बात ही क्या है, और फिर भी आधुनिक पूंजीपति लोगों को इन चीजों के उपभोग के लिए मनाने के लिए हर मनोवैज्ञानिक चाल का उपयोग करने से नहीं हिचकिचाते हैं। आधुनिक शहर मानसिक और वायुमंडलीय प्रदूषण से भरे हुए हैं और आम नागरिक भी उन्हें असहनीय पा रहे हैं। यह छंद यह भी बताता है कि इस युग में वैदिक शास्त्रों की शिक्षाओं को विकृत कर दिया जाएगा। महान विश्वविद्यालय हिंदू धर्म पर पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं जिसमें भारतीय धर्म, इसके विपरीत असीमित साक्ष्यों के बावजूद, बहुदेववादी और अवैयक्तिक मोक्ष की ओर ले जाने वाला बताया गया है। वास्तव में, सभी वैदिक साहित्य एक एकीकृत संपूर्ण है, जैसा कि स्वयं भगवान कृष्ण ने भगवद्-गीता (15.15) में कहा है: "वेदईस च सर्वैरहम एव वेद्यः।" "सभी वेदों के द्वारा मैं [कृष्ण] को जाना जाना चाहिए।" सभी वैदिक साहित्य हमें परम व्यक्तिगत परम सत्य – विष्णु, या कृष्ण के बारे में ज्ञान देने के लिए है। हालांकि कई नामों से जाना जाता है और कई रूपों में प्रकट होता है, ईश्वर एक निरपेक्ष इकाई है और वह एक व्यक्ति है। लेकिन यह सच्ची वैदिक समझ कलियुग में छिपी हुई है। इस छंद में शुकदेव चतुराई से बताते हैं कि "राजनीतिक नेता नागरिकों को व्यावहारिक रूप से निगल जाएंगे और तथाकथित पुजारी और बुद्धिजीवी उनके पेट और जननांगों के भक्त होंगे।" यह कथन कितना दुखद रूप से सत्य है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)