श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 3: भूमि गीत  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.3.26 
सत्त्वं रजस्तम इति द‍ृश्यन्ते पुरुषे गुणा: ।
कालसञ्चोदितास्ते वै परिवर्तन्त आत्मनि ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
काल की शक्ति से सतो, रजो तथा तमोगुण की हलचल चालू हो जाती है और ये रूप बदलते हैं, जिन्हें हम एक व्यक्ति के मन के अंदर देख सकते हैं।
 
The modes of Satva, Rajas and Tamas, whose transformations are seen within the mind of a man, are set in motion by the power of time.
तात्पर्य
इन श्लोकों में वर्णित चार युग, भौतिक प्रकृति के विविध स्वरूपों के प्रकटीकरण हैं। सतयुग सत्य का युग, भौतिक अच्छाई की प्रमुखता प्रकट करता है, एवं कलियुग अज्ञानता की प्रधानता प्रकट करता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, प्रत्येक युग के भीतर अवसर पर अन्य तीन युग उप-युग के रूप में प्रकट होते हैं। इस प्रकार सतयुग में भी अज्ञानता के स्वरूप में एक असुर प्रकट हो सकता है, और कलियुग में कुछ समय के लिए सर्वोच्च धार्मिक सिद्धांतों का विकास हो सकता है। जैसा कि श्रीमद्भागवत में वर्णित है, प्रकृति के तीनों भाव हर जगह और हर चीज़ में उपस्थित हैं, लेकिन प्रमुख भाव या भावों का संयोजन, किसी भी भौतिक परिघटना के सामान्य चरित्र को निर्धारित करता है। इसलिए, प्रत्येक युग में, तीनों भाव अलग-अलग अनुपात में मौजूद होते हैं। एक विशेष युग जो अच्छाई (सत), आवेश (त्रेता), आवेश और अज्ञानता (द्वापर) या अज्ञानता (काली) द्वारा दर्शाया जाता है, प्रत्येक दूसरे युग के भीतर एक उपकारक के रूप में विद्यमान रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)