श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 3: भूमि गीत  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.3.25 
तस्मिन् लुब्धा दुराचारा निर्दया: शुष्कवैरिण: ।
दुर्भगा भूरितर्षाश्च शूद्रदासोत्तरा: प्रजा: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
कलियुग में, लोग लालची, बुरे व्यवहार वाले और निर्दयी होते हैं, और वे बिना किसी अच्छे कारण के एक-दूसरे से लड़ते हैं। भौतिक इच्छाओं से ग्रस्त और दुर्भाग्यपूर्ण, कलियुग के लोग लगभग सभी शूद्र और बर्बर होते हैं।
 
In Kaliyuga people are greedy, wicked and cruel and they fight with each other without any reason. People of Kaliyuga are unfortunate and troubled by material desires, almost all are Shudras and barbarians.
तात्पर्य
इस युग में हम देख सकते हैं कि अधिकांश लोग शूद्र श्रेणी के अंतर्गत आने वाले मजदूर, क्लर्क, मछुआरे, कारीगर और अन्य प्रकार के मजदूर हैं। ईश्वर के प्रबुद्ध भक्त और कुलीन राजनीतिक नेता अत्यंत दुर्लभ हैं, और विशाल व्यावसायिक समूहों द्वारा लगातार उन्हें अधीनस्थ कर्मचारियों में परिवर्तित करने के साथ ही स्वतंत्र व्यवसायी और किसान भी विलुप्त होते जा रहे हैं। पृथ्वी के वृहद क्षेत्र अब बर्बर और अर्ध-बर्बर लोगों द्वारा आबाद किए जा चुके हैं, जो सम्पूर्ण स्थिति को खतरनाक और निराशाजनक बना रहे हैं। कृष्ण चेतना आंदोलन वर्तमान निराशाजनक अवस्था को सुधारने के लिए अधिकृत है। यह कलियुग नामक भयावह युग की एकमात्र आशा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)