श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 2: कलियुग के लक्षण  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.2.6 
दूरे वार्ययनं तीर्थं लावण्यं केशधारणम् ।
उदरंभरता स्वार्थ: सत्यत्वे धार्ष्ट्यमेव हि ।
दाक्ष्यं कुटुम्बभरणं यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
जल के स्रोत को दूरस्थ तीर्थस्थान माना जाएगा, और केवल केश-विन्यास को सुंदरता समझा जाएगा। पेट भरना जीवन का लक्ष्य बन जाएगा, और जो व्यक्ति जितना अधिक दबंग होगा, उसे उतना ही सच्चा माना जाएगा। जो व्यक्ति परिवार का पालन-पोषण कर सकता है, उसे ही कुशल माना जाएगा, और धार्मिक सिद्धांतों का पालन केवल प्रतिष्ठा के लिए किया जाएगा।
 
Pilgrimage will be considered to be a distant water body and beauty will be dependent on the style of hair. Filling the stomach will become the aim of life and the more impudent a person is, the more truthful he will be considered. The person who can support his family will be considered capable. Religion will be followed only for fame.
तात्पर्य
हिंदुस्तान में कई पवित्र स्थान है जहां से पवित्र नदियाँ बहती है | मूर्ख लोग इन नदियों में स्नान करके अपने पापों से छुटकारा पाने का उत्सुकता से प्रयास करते है लेकिन वह ऐसे शिक्षित भक्तों से निर्देश नहीं लेते है जो ऐसे स्थानों में रहते है | भगवन के प्रति निष्ठावान भक्तों से शिक्षा ग्रहण करना चाहिए ना कि केवल धार्मिक संस्कारों को ही महत्व देना चाहिए |

इस युग में, लोग अपने बालों को विभिन्न शैलियों में निरंतर व्यवस्थित करते हैं | वे केवल चेहरे की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए प्रयास करते है | वे नहीं जानते कि वास्तविक सुंदरता हृदय से आती है, आत्मा से आती है और केवल वही व्यक्ति सही मायनों में आकर्षक है जो शुद्ध है। जैसे जैसे इस युग की कठिनाइयाँ बढ़ती जाती है, पेट भरना ही सफलता की निशानी होगी और जो अपने परिवार का भरण पोषण कर सकता है उसे आर्थिक मामलों में बुद्धिमान माना जाएगा। धर्म का पालन केवल प्रतिष्ठा के लिए और भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझे बिना किया जाएगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)