श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 2: कलियुग के लक्षण  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.2.5 
अनाढ्यतैवासाधुत्वे साधुत्वे दम्भ एव तु ।
स्वीकार एव चोद्वाहे स्न‍ानमेव प्रसाधनम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
यदि किसी व्यक्ति के पास धन नहीं है, तो उसे अपवित्र माना जाएगा और ढोंग को पुण्य माना जाएगा। विवाह केवल मौखिक समझौते से तय किए जाएंगे, और कोई भी व्यक्ति जनता के बीच आने के लिए खुद को योग्य समझेगा यदि उसने केवल स्नान किया हो।
 
If a person did not have wealth, he would be considered impure and ostentation would be considered a virtue. Marriages would be arranged by verbal consent and a person would be considered fit to appear in public if he had simply taken a bath.
तात्पर्य
शब्द 'दंभ' एक आत्म-धर्मी ढोंगी को इंगित करता है - जो कोई व्यक्ति संत होने से इतना अधिक चिंतित नहीं होता जितना कि एक संत की भांति दिखने से। कलियुग में आत्म-धर्मी, ढोंगी धार्मिक कट्टरपंथियों की संख्या काफ़ी अधिक है जो यह दावा करते हैं कि उनके पास ही एकमात्र रास्ता है, एकमात्र सच्चाई है और एकमात्र प्रकाश है। कई मुस्लिम देशों में इस मानसिकता के कारण धार्मिक स्वतंत्रता पर क्रूर दमन हुआ है और इस प्रकार आध्यात्मिक प्रबोधन के लिए अवसर नष्ट हो गया है। सौभाग्य से, पश्चिमी दुनिया में एक मुक्त धार्मिक अभिव्यक्ति प्रणाली है। हालाँकि, पश्चिम में भी, आत्म-धर्मी ढोंगी अन्य धर्मों के ईमानदार और संत अनुयायियों को मूर्तिपूजक और शैतान मानते हैं।

पश्चिमी धार्मिक कट्टरपंथी आमतौर पर धूम्रपान, शराब, यौन संबंध, जुआ और पशु हत्या जैसी कई बुरी आदतों के आदी हैं। हालाँकि कृष्ण चेतना आंदोलन के अनुयायी अवैध यौन संबंध, नशा, जुआ और पशु हत्या से पूरी तरह से परहेज करते हैं, और हालाँकि वे अपना जीवन ईश्वर के निरंतर गौरव के लिए समर्पित करते हैं, आत्म-धर्मी ढोंगी दावा करते हैं कि इस तरह का सख्त संयम और ईश्वर के प्रति भक्ति "शैतान की चाल" है। इस प्रकार पापियों को धार्मिक के रूप में बढ़ावा दिया जाता है, और संतों को राक्षसी के रूप में निंदा की जाती है। आध्यात्मिकता के सबसे अल्पविकसित मानदंडों को समझने की यह दयनीय अक्षमता कलि-युग का एक प्रमुख लक्षण है।

इस युग में विवाह की संस्था पतनशील होगी। वास्तव में, पहले से ही एक विवाह प्रमाण पत्र को कभी-कभी निंदनीय रूप से "कागज के एक टुकड़े" के रूप में अस्वीकार कर दिया जाता है। विवाह के आध्यात्मिक उद्देश्य को भूलना और यौन संबंध को पारिवारिक जीवन का लक्ष्य समझना, कामुक पुरुष और महिलाएँ एक कानूनी रिश्ते की तकलीफ़देह औपचारिकताओं और जिम्मेदारियों के बिना सीधे यौन संबंधों में लिप्त हो जाते हैं। ऐसे मूर्ख लोग तर्क देते हैं कि "यौन संबंध स्वाभाविक है।" लेकिन अगर यौन संबंध स्वाभाविक है, तो गर्भावस्था और प्रसव भी समान रूप से स्वाभाविक हैं। और बच्चे के लिए यह निश्चित रूप से स्वाभाविक है कि उसका लालन-पालन एक प्यारे पिता और माँ द्वारा किया जाए और वास्तव में पूरे जीवन में उसके वही पिता और माँ हों। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पुष्टि होती है कि एक बच्चे को उसकी ज़रूरतों के लिए उसके पिता और माँ दोनों की देखभाल करने की ज़रूरत होती है और इस प्रकार यौन संबंध का होना एक स्थायी विवाह व्यवस्था के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है। पाखंडी लोग असीमित यौन संबंधों को "यह स्वाभाविक है" कहकर उचित ठहराते हैं, लेकिन यौन संबंध के प्राकृतिक परिणाम - गर्भावस्था - से बचने के लिए, वे गर्भ निरोधकों का उपयोग करते हैं, जो निश्चित रूप से पेड़ों पर नहीं उगते हैं। वास्तव में, गर्भ निरोधक बिल्कुल भी स्वाभाविक नहीं हैं। इस प्रकार कलियुग में पाखंड और मूर्खता प्रचुर मात्रा में है।

इस श्लोक का समापन यह कहते हुए होता है कि लोग वर्तमान युग में अपने शरीर को ठीक से सजाने की उपेक्षा करेंगे। एक इंसान को अपने शरीर को विभिन्न धार्मिक आभूषणों से सजाना चाहिए। वैष्णव अपने शरीर को भगवान के पवित्र नाम से युक्त तिलक से चिह्नित करते हैं। लेकिन कलियुग में, धार्मिक और यहाँ तक कि भौतिक औपचारिकताओं को बिना सोचे-समझे त्याग दिया जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)