श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 2: कलियुग के लक्षण  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.2.44 
ये ये भूपतयो राजन् भुञ्जते भुवमोजसा ।
कालेन ते कृता: सर्वे कथामात्रा: कथासु च ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा परीक्षित, इन सारे राजाओं ने अपनी ताकत से पृथ्वी पर राज करने की कोशिश की, लेकिन समय की शक्ति ने इन्हें नष्ट कर दिया और अब ये सिर्फ इतिहास में नाम बचे हैं।
 
O King Parikshit, all these kings who wanted to enjoy the earth by their might, all of them, due to the power of time, became mere historical accounts.
तात्पर्य

इस श्लोक में "राजन्", "हे राजन" शब्द महत्त्वपूर्ण है। परीक्षित महाराज अपने शरीर का त्याग और गृह-वापसी, भगवान के पास जाने की तैयारी कर रहे थे, और उनके अत्यधिक दयालु आध्यात्मिक गुरु शुकदेव गोस्वामी ने यह दिखाकर किंग की पदवी की किसी भी संभावित आसक्ति को खत्म कर दिया कि ऐसी स्थिति का अंततः क्या महत्व है। आध्यात्मिक गुरु की निस्वार्थ दया से व्यक्ति गृह-वापसी, भगवान के पास वापस जाने के लिए तैयार होता है। आध्यात्मिक गुरु व्यक्ति को भौतिक मोह पर अपने मजबूत पकड़ को ढीला करना और माया के राज्य को छोड़ना सिखाता है। हालाँकि इस अध्याय में शुकदेव गोस्वामी तथाकथित भौतिक संसार की महिमा के बारे में बहुत स्पष्ट रूप से बोलते हैं, लेकिन वह आध्यात्मिक गुरु की निस्वार्थ दया का प्रदर्शन कर रहे हैं, जो अपने समर्पित शिष्य को भगवान के राज्य, वैकुंठ में वापस ले जाते हैं।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध बारह के अंतर्गत दूसरा अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)