इस श्लोक में "राजन्", "हे राजन" शब्द महत्त्वपूर्ण है। परीक्षित महाराज अपने शरीर का त्याग और गृह-वापसी, भगवान के पास जाने की तैयारी कर रहे थे, और उनके अत्यधिक दयालु आध्यात्मिक गुरु शुकदेव गोस्वामी ने यह दिखाकर किंग की पदवी की किसी भी संभावित आसक्ति को खत्म कर दिया कि ऐसी स्थिति का अंततः क्या महत्व है। आध्यात्मिक गुरु की निस्वार्थ दया से व्यक्ति गृह-वापसी, भगवान के पास वापस जाने के लिए तैयार होता है। आध्यात्मिक गुरु व्यक्ति को भौतिक मोह पर अपने मजबूत पकड़ को ढीला करना और माया के राज्य को छोड़ना सिखाता है। हालाँकि इस अध्याय में शुकदेव गोस्वामी तथाकथित भौतिक संसार की महिमा के बारे में बहुत स्पष्ट रूप से बोलते हैं, लेकिन वह आध्यात्मिक गुरु की निस्वार्थ दया का प्रदर्शन कर रहे हैं, जो अपने समर्पित शिष्य को भगवान के राज्य, वैकुंठ में वापस ले जाते हैं।
