बेशक, कट्टर भौतिकवादी तर्क दे सकते हैं कि भगवान कल्कि की यह तस्वीर मानवीय दिमाग की एक मात्र मानवरूपी रचना है - एक पौराणिक देवता जो उन लोगों द्वारा बनाया गया है जिन्हें किसी श्रेष्ठ प्राणी पर विश्वास करने की जरूरत है। लेकिन यह तर्क न तो तार्किक है और न ही यह कुछ साबित करता है। यह केवल कुछ लोगों की राय है। हमें पानी की जरूरत है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मनुष्य पानी बनाता है। हमें भोजन, ऑक्सीजन और कई अन्य चीजों की भी जरूरत है जो हम नहीं बनाते हैं। चूंकि हमारा सामान्य अनुभव यह है कि हमारी ज़रूरतें बाहरी दुनिया में मौजूद उपलब्ध वस्तुओं के अनुरूप हैं, कि हमें एक सर्वोच्च प्रभु की आवश्यकता प्रतीत होती है, यह इंगित करेगा कि वास्तव में एक सर्वोच्च प्रभु है। दूसरे शब्दों में, प्रकृति हमें उन चीजों की आवश्यकता की भावना से संपन्न करती है जो वास्तव में मौजूद हैं और वास्तव में हमारे कल्याण के लिए आवश्यक हैं। इसी तरह, हम ईश्वर की आवश्यकता का अनुभव करते हैं क्योंकि हम वास्तव में ईश्वर का हिस्सा हैं और उसके बिना नहीं रह सकते। कलि-युग के अंत में यही ईश्वर शक्तिशाली कल्कि अवतार के रूप में प्रकट होंगे और राक्षसों को प्रदूषण से मारेंगे।
