पश्चिमी देशों में, धर्मशास्त्री वैज्ञानिक रूप से भगवान के नियमों को या वास्तव में स्वयं भगवान को प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे हैं, और इस प्रकार पश्चिमी बौद्धिक इतिहास में धर्मशास्त्र और विज्ञान के बीच एक कठोर द्वंद्व उत्पन्न हुआ है। इस विवाद को हल करने के प्रयास में, कुछ धर्मशास्त्रियों ने अपने सिद्धांतों को संशोधित करने के लिए सहमति व्यक्त की है ताकि वे न केवल सिद्ध वैज्ञानिक तथ्यों से मेल खाते हों बल्कि छद्म वैज्ञानिक अटकलों और परिकल्पनाओं से भी मेल खाते हों, जो हालांकि अप्रमाणित हैं, लेकिन पाखंडी रूप से "विज्ञान" के दायरे में शामिल हैं। दूसरी ओर, कुछ कट्टर धर्मशास्त्री वैज्ञानिक पद्धति की पूरी तरह से उपेक्षा करते हैं और अपने पुरातन, संप्रदायवादी हठधर्मिता की सत्यता पर जोर देते हैं।
इस प्रकार व्यवस्थित वैदिक धर्मशास्त्र से वंचित, भौतिक विज्ञान स्थूल भौतिकवाद के विनाशकारी क्षेत्र में चला गया है, जबकि सैद्धांतिक पश्चिमी दर्शन सापेक्षतावादी नैतिकता और अनिर्णायक भाषाई विश्लेषण की सतही स्थिति में चला गया है। भौतिकवादी विश्लेषण के लिए समर्पित इतने सारे सर्वोत्तम पश्चिमी दिमागों के साथ, स्वाभाविक रूप से पश्चिमी धार्मिक जीवन का अधिकांश हिस्सा, बौद्धिक मुख्यधारा से अलग हो गया है, तर्कहीन कट्टरता और अनधिकृत रहस्यमय और रहस्यवादी संप्रदायों का वर्चस्व है। लोग भगवान के विज्ञान के बारे में इतने अनजान हो गए हैं कि वे अक्सर कृष्ण भावना आंदोलन को धर्मशास्त्र और धर्म के काल्पनिक प्रयासों के इस विषम वर्गीकरण के साथ जोड़ देते हैं। इस प्रकार धर्म, या सच्चा धर्म, जो कि भगवान के नियम का कठोर और सचेत पालन है, घट रहा है।
सत्यम्, सत्यता भी कम हो रही है, केवल इसलिए कि लोग नहीं जानते कि सत्य क्या है। परम सत्य जाने बिना, कोई व्यक्ति केवल सापेक्ष या काल्पनिक सत्यों की विशाल मात्रा एकत्र करके जीवन के वास्तविक महत्व या उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझ नहीं सकता है।
क्षमा, सहिष्णुता या क्षमा भी कम हो रही है, क्योंकि कोई व्यावहारिक तरीका नहीं है जिससे लोग खुद को शुद्ध कर सकें और इस प्रकार ईर्ष्या से मुक्त हो सकें। जब तक कोई व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति के किसी अधिकृत कार्यक्रम में भगवान के पवित्र नामों का जाप करके शुद्ध नहीं हो जाता है, तब तक मन क्रोध, ईर्ष्या और सभी प्रकार की छोटी-मोटी चीजों से अभिभूत रहेगा। इस प्रकार दया, दया भी घट रही है। सभी जीवित प्राणी भगवान के दिव्य अस्तित्व में अपनी सामान्य भागीदारी से हमेशा के लिए जुड़े हुए हैं। जब इस अस्तित्ववादी एकता को नास्तिकता और अज्ञेयवाद के माध्यम से अस्पष्ट किया जाता है, तो लोग एक दूसरे के प्रति दयालु होने के लिए इच्छुक नहीं होते हैं; वे अन्य जीवित प्राणियों के कल्याण को बढ़ावा देने में अपने स्वार्थ को नहीं पहचान सकते हैं। वास्तव में, लोग अब स्वयं के प्रति भी दयालु नहीं हैं: वे व्यवस्थित रूप से शराब, नशीली दवाओं, तंबाकू, मांसाहार, यौन संकीर्णता और जो भी अन्य सस्ते संतुष्टिदायक प्रक्रियाएं उनके लिए उपलब्ध हैं, के माध्यम से खुद को नष्ट कर लेते हैं।
इन सभी आत्मघाती प्रथाओं और समय के शक्तिशाली प्रभाव के कारण, औसत जीवन काल (आयु) कम हो रहा है। आधुनिक वैज्ञानिक, लोगों के बीच विश्वसनीयता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, अक्सर आंकड़े प्रकाशित करते हैं कि विज्ञान ने जीवन की औसत अवधि को बढ़ा दिया है। लेकिन ये आंकड़े गर्भपात की क्रूर प्रथा के माध्यम से मारे गए लोगों की संख्या को ध्यान में नहीं रखते हैं। जब हम कुल जनसंख्या की जीवन प्रत्याशा में गर्भपात कराए गए बच्चों का आंकड़ा जोड़ते हैं, तो हम पाते हैं कि कलियुग में जीवन की औसत अवधि बिल्कुल भी नहीं बढ़ी है बल्कि इसके बजाय तेजी से घट रही है।
बलम्, शारीरिक शक्ति भी घट रही है। वैदिक साहित्य बताता है कि पाँच हज़ार साल पहले, पिछले युग में, मनुष्य - और यहाँ तक कि जानवर और पौधे भी - बड़े और मज़बूत थे। कलियुग की प्रगति के साथ, शारीरिक कद और ताकत धीरे-धीरे कम हो जाएगी।
निस्संदेह स्मृति कमज़ोर होती जा रही है। पिछले ज़मानों में इंसानों की याददाश्त बहुत तेज़ होती थी और वो लोग भयानक नौकरशाही और तकनीकी समाज का बोझ अपने ऊपर नहीं लेते थे जैसा कि हमने किया है। इस कारण ज़रूरी जानकारी और स्थायी ज्ञान को लिखे बिना ही याद रख लिया जाता था। बेशक, कलियुग में चीजें बहुत तेज़ी से बदल रही हैं।
